


जन्मजात स्कोलियोसिस (कॉन्जेनाइटल स्कोलियोसिस)जन्मजात स्कोलियोसिस रीढ़ की हड्डी का ऐसा झुकाव है, जो रीढ़ की कशेरुकाओं में आई विकृतियों या उनके असामान्य विकास के कारण होता है। ये विकृतियों गर्भधारण करने के 4-6 सप्ताह के भीतर, गर्भ में ही उत्पन्न हो जाती हैं। विशेष असामान्यतायें हैं- हेमीवर्टीब्रा, जिसमें कशेरुकायें आधी या त्रिकोणीय हो जाती हैं, अनसेग्मेंटेड बार, जिसमें कशेरुकायें सामान्य रूप से अलग-अलग नहीं हो पातीं और मिली-जुली असामान्यतायें। इन असामान्य कशेरुकाओं की संख्या, उनकी स्थिति, और उनके आसपास वृद्धि की संभावना से तय होता है कि ये जन्मजात झुकाव कितने गंभीर प्रकृति के हो सकते हैं। यदि केवल एक ही कशेरुका में बहुत हल्की असामान्यता है, तो उसका पता आसानी से नहीं लग पाता और किसी अन्य प्रयोजन से किये जा रहे छाती के एक्स-रे या दूसरे किसी अध्ययन में संयोगवश उसका पता लग पाता है। जिन रोगियों में अनेक असामान्यतायें होती हैं, उनका धड़ बहुत छोटा रह जाने की आशंका होती है और रीढ़ की हड्डी में गंभीर विकृति दिखाई पड़ती है। यदि ऐसे मामलों में, इलाज न किया जाये तो रीढ़ की हड्डी का झुकाव अक्सर बढ़ता जाता है, जिसके कारण फेफड़ों की गंभीर बीमारी तथा/अथवा तंत्रिका-तंत्र का ह्रास भी हो सकता है। जन्मजात स्कोलियोसिस के मरीज़ों के शरीर के अन्य अंगों की प्रणालियों में भी असामान्यतायें पाये जाने की संभावना अधिक रहती है। उदाहरण के लिए, 10% मामलों में हृदय की असामान्यतायें, 25% मामलों में प्रजनन-मूत्र तंत्र की असामान्यतायें और 40% तक मामलों में रीढ़ की हड्डी के भीतर असामान्यतायें पाई जाती हैं। इसलिए मरीज़ों की सावधानी से जाँच की जाती है और जो मरीज़ सामान्य दिखाई पड़ते हैं उन्हें भी सर्जरी से पहले जाँच के लिए भेजा जाता है। इन परीक्षणों में शामिल हैं- इकोकार्डियोग्राम, गुर्दों का अल्ट्रासाउंड, और पूरी रीढ़ की हड्डी की MRI स्क्रीनिंग। रीढ़ की हड्डी के भीतर जो गड़बड़ियाँ हो सकती हैं, उनमें शामिल हैं - स्पाइनल कैनाल के वसायुक्त निर्दोष ट्यूमर (लाइपोमास), स्कार टिश्यू, हड्डी या कार्टिलेज के स्पिक्यूल (डायस्टेमेटोमाइलिया), और अनेक अन्य समस्यायें। इनका रीढ़ की हड्डी के झुकाव के इलाज से अलग भी इलाज करवाना पड़ सकता है। जन्मजात स्कोलियोसिस का ज़बर्दस्त इलाज ज़रूरी होता है। अगर इसमें अपेक्षाकृत कम झुकाव होने के बावजूद वृद्धि दिखाई देती है तो सर्जरी कराने की सलाह दी जाती है। परम्परागत रूप से यही सबसे सही तरीका है क्योंकि सर्जरी अगर जल्दी हो जाये तो बाद में बहुत अधिक व्यापक सर्जरी से बचा जा सकता है। एक से डेढ़ साल के मरीज़ बच्चों में हल्की विकृति पाए जाने के बावजूद उनकी सर्जरी कर दिया जाना असामान्य घटना नहीं है। ग़ैर-ऑपरेशन वाले इलाज में 4 से 6 महीनों के अंतराल पर मरीज़ को देखा-परखा जाता है और अगर रोग बढ़ता दिखाई देता है तो सर्जरी की सलाह दी जाती है। ब्रेसिंग का प्रयोग केवल कुछ प्रतिशत मरीज़ों के लिए किया जाता है, जिनकी जन्मजात असामान्यताओं के पास एक पूरक प्रकृति का झुकाव लगाकर बदतर हालत में पहुँचने से रोका जा सकता है। सर्जरी जल्द से जल्द करना अच्छा होता है क्योंकि इस तरह इलाज की आवश्यकता वाले रीढ़ की हड्डी के स्तरों की संख्या कम से कम रखी जा सकती है। जल्दी की जाने वाली सर्जरी में हेमीवर्टीब्रा एक्सिज़न शामिल है, जिसमें असामान्य कशेरुका को हटा दिया जाता है, जिससे रीढ़ की हड्डी लगभग पूरी तरह सीधी हो जाती है और असामान्य कशेरुका के आसपास के हिस्से स्वाभाविक ढंग से बढ़ पाते हैं। अधिक जटिल जन्मजात असामान्यताओं में, रीढ़ की हड्डी के अगले और पिछले दोनों हिस्सों में अनेक स्तरीय संयोजन की ज़रूरत पड़ सकती है। अन्य मामलों में, ग्रोथ रॉड पद्धति अपनाई जा सकती है (देखें लेख छोटी उम्र में स्कोलियोसिस)। इसका लक्ष्य है गंभीर विकृतियों के कारण फेफड़ों के विकास और गतिविधियों को प्रभावित होने से बचाना तथा रीढ़ की हड्डी को आरामदेह संतुलन उपलब्ध कराना और छोटे बच्चों को अधिक से अधिक बढ़ने की सुविधा देना। सर्जरी के बाद, हड्डियों का पूरा विकास होने तक मरीज़ों का पूरा ध्यान रखा जाता है, इसमें शुरुआती प्रक्रिया के बाद 15 वर्ष या उससे भी अधिक समय लग सकता है। कुछ मामलों में, अतिरिक्त झुकाव होने लगता है जिससे सर्जरी या ब्रेसिंग की ज़रूरत हो सकती है। गंभीर झुकाव और विकृति वाले मरीज़ों को देर से डॉक्टर के पास ले जाने पर उन्हें ऑस्टियोटॉमी (हड्डी को काटना), कशेरुकाओं को हटाने और उपकरणों की सहायता से रीढ़ की हड्डी के पुनर्निर्माण की ज़रूरत पड़ सकती है। इन मरीज़ों के लिए लक्ष्य होता है, रीढ़ की हड्डी का संतुलन और सीधापन वापस लाना, और पीठ के दर्द, तंत्रिका-तंत्र की ख़ामियों के साथ-साथ फेफड़ों की श्वसनक्रिया-संबंधी गड़बड़ी रोकना। कुछ मरीज़ों में जन्मजात स्कोलियोसिस से जुड़ी एक और समस्या पाई जाती है - पसलियों की असामान्यता, जिसमें पसलियाँ या तो होती ही नहीं हैं या आपस में जुड़ी होती हैं। इससे छाती के बीच के खाली हिस्से की वृद्धि में बाधा पड़ती है और फेफड़ों का विकास सीमित हो जाता है, इसके कारण साँस लेने में गंभीर तकलीफ़ होने की भी आशंका होती है। सैन एंटोनियो, टेक्सास में विकसित एक पद्धति में छाती के पिंजर (थोरैक्स) को एक विशेष उपकरण (Veptr) से फैलाया जाता है ताकि गंभीर रूप से प्रभावित मरीज़ों के फेफड़े बेहतर ढंग से काम कर सकें और उन्हें काम करने की स्थिति में रखा जा सके। मामले का उदाहरण #1
यह एक 6 वर्षीय बालक है, जिसके एल4 के हेमीवर्टीब्रा को एक्सिज़न के ज़रिये निकाल कर उसका इलाज किया गया है। इस रोग से जुड़े झुकाव को 37 डिग्री से 0 डिग्री कर दिया गया है। बालक पर 6 महीने बाद किसी तरह की रोक-टोक नहीं थी। मामले का उदाहरण #2
इस 11 वर्षीय बालिका को हेमीवर्टीब्रा के कारण 49 डिग्री का जन्मजात झुकाव था। इसके कारण उसका संतुलन बिगड़ा हुआ था। इसकी हेमीवर्टीब्रा का भी एक्सिज़न पद्धति से इलाज किया गया। उसका संतुलन लौट आया और झुकाव दुरुस्त कर दिया गया। अब उस पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
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