


किशोर इडियोपैथिक स्कोलियोसिसकिशोर इडियोपैथिक स्कोलियोसिस (AIS) रीढ़ की हड्डी का पार्श्व की ओर झुकाव है जो 10 वर्ष से वयस्क होने की आयु तक के किशोरों में हो सकता है। इसमें रीढ़ की हड्डी में बाँयीं अथवा दायीं ओर झुकाव आ जाता है। कभी-कभी AIS मासिक धर्म शुरू होने के समय या किशोरों की वृद्धिक्रम के दौरान शुरू हो सकता है।
इडियोपैथिक का अर्थ यह है कि अज्ञात कारणों से असामान्य झुकाव विकसित हो गया हो। कुछ किशोरों में वंशानुगत कारणों से AIS होने की निश्चित संभावना रहती है। तीन से पाँच प्रतिशत किशोरों में किसी न किसी रूप में स्कोलियोसिस पाई जाती है। इन किशोरों में अधिकांश लड़कियाँ होती हैं, जिनका झुकाव अधिक तेज़ी से बढ़ता है। लक्षण AIS का इलाज कराना ज़रूरी है क्योंकि बढ़ती हुई स्कोलियोसिस का अगर इलाज न हो, तो काफ़ी बड़ी विकृति पैदा हो सकती है। विकृति के कारण मनोवैज्ञानिक कष्ट और शारीरिक अपंगता हो सकती है, ख़ास तौर पर किशोर मरीज़ों में। इसके अलावा, विकृति के गंभीर शारीरिक परिणाम भी हो सकते हैं। जब रीढ़ की हड्डी की कशेरुकायें घूमने लगती हैं, तो पसलियों के ढाँचे पर भी असर पड़ता है, जिसके कारण हृदय और फेफड़ों का कामकाज भी प्रभावित हो सकता है (जैसे साँस फूलना)। बढ़ने वाली स्कोलियोसिस जब रीढ़ की हड्डी के लम्बर भाग को प्रभावित करती है तब शरीर को पस्त कर देने वाला दर्द हो सकता है। निदान चिकित्सीय पृष्ठभूमि के बारे में पूछे गये सवालों में माता-पिता की वंशानुगत जानकारी भी शामिल होगी। क्या परिवार के अन्य सदस्यों को भी स्कोलियोसिस है? यदि ऐसा है, तो स्कोलियोसिस किस तरह बढ़ी और क्या इलाज किया गया? डॉ. लोनर किसी ऐसी बीमारी का भी पता लगायेंगे, जिसके कारण स्कोलियोसिस उत्पन्न हुई हो। इसके अलावा, मरीज़ की आयु, किशोरवस्था की शुरुआत, और लड़कियों में मासिक धर्म शुरू होने की आयु से हमें यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि बच्चे की अस्थियों के परिपक्व होने में कितने वर्ष बाकी हैं। यदि रीढ़ की हड्डी का झुकाव 40-45 डिग्री से कम होगा, तो हो सकता है अस्थियों के परिपक्व होने तक उसका बढ़ना रुक जाये। यदि झुकाव 40-45 डिग्री से अधिक होगा तो हो सकता है कि वह वयस्क जीवन के दौरान बढ़ता रहे। शारीरिक और तंत्रिका रोगों के अध्ययन से संबंधित जाँच के दौरान डॉ. लोनर मरीज़ के स्वास्थ्य और उसकी सामान्य चुस्ती का आकलन करेंगे। इन परीक्षणों से चिकित्सक को वह “आधारभूमि” मिल जाती है, जिससे भविष्य में झुकाव के बढ़ने का पता लगाया जा सकता है। एक आम परीक्षण में निम्न बातें शामिल होती हैं: टेबल 1
निदानात्मक जाँच में निम्न बातें शामिल होती हैं: टेबल 2
ग़ैर-सर्जिकल उपचार छोटे झुकावों (15-20 डिग्री से कम) की लंबे समय तक निगरानी की जाती है ताकि उनके बढ़ने की संभावना का पता लग सके। इस स्तर पर, किसी विशेष इलाज की ज़रूरत नहीं होती। बड़े झुकावों (20-40 डिग्री के बीच) को और बढ़ने से रोकने के लिए ब्रेसिंग की ज़रूरत होती है। कुछ किशोरों को प्रतिदिन 16 से 23 घंटे ब्रेस पहनने में कठिनाई होती है। ब्रेसेज़ बच्चों कि लिए तकलीफ़देह, अनाकर्षक, और गर्मी महसूस कराने वाली हो सकती हैं। कपड़ों के अंदर छिपे होने के बावजूद, बच्चा ब्रेसेज़ से शर्मिंदगी महसूस कर सकता है। लेकिन, अगर ब्रेसिंग कारगर हो और उससे सर्जरी को टाला जा सके, तो प्रतिबद्धता सफल हो जाती है। इस समय सावधानी से तैयार किये गये व्यायाम कार्यक्रम का भी सुझाव दिया जा सकता है। दुर्भाग्यवश, कुछ झुकावों पर ब्रेसिंग का कोई असर नहीं होता। सर्वाइकोथोरैसिक झुकावों (पीठ के बीच से गर्दन तक) और 40 डिग्री से अधिक के झुकावों पर ब्रेसिंग का कोई ख़ास असर नहीं देखा जाता है। इसके अलावा, कुछ बड़े मरीज़ जो अस्थियों की दृष्टि से वयस्क होने के क़रीब हैं, उन पर भी ब्रेसिंग का असर नहीं होता। सर्जिकल उपचार रीढ़ की हड्डी के शल्यचिकित्सक AIS के इलाज के लिए विभिन्न सर्जिकल पद्धतियों का प्रयोग करते हैं। उनका मूल लक्ष्य तो हमेशा एक ही होता है, लेकिन अलग-अलग मामलों में अलग-अलग तकनीकों और उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। डॉ. लोनर इसका ऑपरेशन सामने (एन्टीरियर) से या पीछे (पोस्टीरियर) से कर सकते हैं। वे कम से कम चीरे लगाने वाली तकनीक का भी व्यापक इस्तेमाल कर सकते हैं। सर्जरी के पात्र मरीज़ों के लिए, अनेक पद्धतियाँ उपलब्ध हैं। किसी व्यक्ति के लिए कौन सी पद्धति सर्वश्रेष्ठ है, इसका फ़ैसला डॉ. लोनर झुकाव के आकार, झुकाव के प्रसार (रीढ़ की हड्डी के प्रभावित स्तरों की संख्या), झुकाव स्थल, और मरीज़ की आयु के आधार पर करते हैं। हर पद्धति का अपना एक विशिष्ट लाभ होता है जो उसे किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त बनाता है। थोरैकोस्कोपिक पद्धति से किशोर वय के मरीज़ का थोरैसिक झुकाव ठीक किया जा सकता है। यह ऑपरेशन छाती की कैविटी के बगल में बहुत छोटे चीरे लगाकर किया जाता है। इसका लाभ यह है कि ऑपरेशन के निशान कम से कम होते हैं और सर्जरी के बाद दर्द भी पारंपरिक पद्धति से की गई सर्जरी की अपेक्षा बहुत कम होता है। इसके अलावा, इस तकनीक से खून बहुत कम निकलता है और अन्य तकनीकों की अपेक्षा रीढ़ की हड्डी के कम स्तरों का संयोजन किया जाता है। यह पद्धति सब मरीज़ों के लिए नहीं है और यदि यह किसी के लिए उपयुक्त होगी तो, डॉ. लोनर इसके उपयोग के बारे में चर्चा करेंगे (थोरैकोस्कोपिक सर्जरी पर लेख देखें)। किशोर इडियोपैथिक स्कोलियोसिस के लिए सबसे आम पद्धति पीठ की ओर (पोस्टिरियर) से की जा जाने वाली इलाज पद्धति है। हाल के वर्षों में, रीढ़ की हड्डी के झुकाव को दुरुस्त करने और संतुलन लौटाने के लिए थोरैसिक और लम्बर स्पाइन में पेडिकल पेंच लगाये जाते हैं। पेडिकल पेंचों के इस्तेमाल से पकड़ बहुत मज़बूत बनती है, जिसके कारण मरीज़ सर्जरी के 2-3 महीनों के अंदर ही सामान्य गतिविधियाँ कर सकता है। पहले, हुक का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे गतिविधियाँ कम से कम 6 महीने तक बाधित रहती थीं। कुछ मरीज़ों के लिए, 75 डिग्री या 80 डिग्री से अधिक के बहुत गंभीर झुकावों को ठीक करने के लिए सामने (एन्टीरियर) और पीछे (पोस्टीरियर), दोनों ओर से प्रयोग में लाई जाने वाली पद्धतियों की संयुक्त रूप से ज़रूरत होती है। आगे की पद्धति में या तो थोरैकोस्कोपिक तकनीक अपनाई जाती है, या लम्बर के झुकाव के लिए छोटे चीरे वाली खुली तकनीक की ज़रूरत होती है, जिससे रीढ़ की हड्डी को अधिक लचीला बनाया जा सकता है। ऐसा करने के लिए चक्रिकायें हटा दी जाती हैं और उनकी जगह पर हड्डी के ग्राफ़्ट लगाये जाते हैं, इसके बाद पीछे वाली तकनीक का इस्तेमाल करते हुए स्क्रू लगाये जाते हैं। इस पद्धति से सामान्यतः 90 डिग्री के झुकाव को 15 डिग्री तक कम किया जाता है। ऊपर वर्णित सभी तकनीकों से 50 डिग्री के झुकाव को 10 डिग्री से भी कम तक लाया जा सकता है। मामले का उदाहरण #1
55 डिग्री इडियोपैथिक स्कोलियोसिस वाली इस 12 वर्षीय बालिका का इलाज कम से कम चीरे वाली थोरैकोस्कोपिक सर्जरी से किया गया। इसके परिणामस्वरूप उसका थोरैसिक झुकाव 15 डिग्री से कम हो गया। ध्यान दें कि इस तकनीक का यह भी फ़ायदा है कि इसमें लम्बर स्पाइन को छेड़ा नहीं जाता, जिसके कारण रीढ़ की हड्डी का लचीलापन बना रहता है और उसमें संतुलित सुधार होता है। कॉम्पेन्सेटरी लम्बर झुकाव को संयोजित किये बग़ैर, थोरैसिक स्पाइन के संयोजन को चयन की जाने वाली थोरैसिक संयोजन कहते हैं। मामले का उदाहरण #2
इस 14 वर्षीय बालिका का 47 डिग्री का थोरैकोलम्बर झुकाव ठीक करने के लिए सामने से स्पाइनल संयोजन करने और उपकरण लगाने हेतु ऑपरेशन किया गया। इसका थोरैसिक झुकाव बग़ैर संयोजन के छोड़ दिया गया क्योंकि वह पूरक प्रकृति का था, वह वास्तविक ढाँचागत झुकाव नहीं था। इस चयनात्मक थोरैकोलम्बर संयोजन के फलस्वरूप उसका झुकाव ठीक होकर 10 डिग्री से कम हो गया। मामले का उदाहरण #3
इस 12 वर्षीय बालिका को दोहरा ढाँचागत झुकाव था और दोनों ही 90 डिग्री से अधिक थे। सामने और पीछे की पद्धतियों के संयुक्त प्रयोग से दोनों झुकावों को दुरुस्त कर 15 डिग्री से कम कर दिया गया। मरीज़ सर्जरी के 4 महीने बाद अपनी पूरी गतिविधियाँ शुरू करने में सक्षम हो गयी। मामले का उदाहरण #4
ताइवान की इस 18 वर्षीय युवती की रीढ़ की हड्डी में 100 डिग्री का झुकाव था। इसका इलाज थोरैकोस्कोपिक रिलीज़ और फ़्यूज़न से किया गया ताकि रीढ़ में ज्यादा लचीलापन आ सके और उसके बाद पीछे से भी फ़्यूज़न किया गया। दोनों पद्धतियाँ एक ही प्रक्रिया के रूप में अपनाई गईं। देखिये, सर्जरी के कुछ ही समय बाद इसके ज़बर्दस्त झुकाव में कितना सुधार आया है और कैसे क्लीनिकल परिणाम प्राप्त हुए हैं। इसमें चीरा दिखाई दे रहा है क्योंकि यह क्लीनिकल फोटो, सर्जरी के दो सप्ताह के भीतर खींचा गया था। सर्जरी के कुछ महीने बाद यह निशान ग़ायब हो जायेगा। निष्कर्ष
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