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दर्द का प्रबंधन – हस्तक्षेप पद्धति
दर्द प्रबंधन के ग़ैर-ऑपरेशन तरीके हैं - नर्व ब्लॉक्स, एपिड्यूरल स्टीरॉयड इंजेक्शन और रेडियोफ्रीक्वेंसी नर्व एब्लेशन। थेराप्यूटिक इंजेक्शनों को दवा और फ़िज़िकल थेरेपी का सहायक माना जा सकता है। इंजेक्शन थेरेपी डीजेनेरेटिव डिस्क रोग, चोट, ऑस्टियोआर्थराइटिस और रीढ़ की हड्डी की अन्य बीमारियों से होने वाले दर्द पर क़ाबू पाने में सहायक हो सकती है। दर्द प्रबंधन में कोशिश रहती है कि तेज़ और पुराने दर्द से राहत मिले और उस पर क़ाबू पाया जा सके। टेबल 1: दर्द के प्रकार
| दर्द के प्रकार |
लक्षण विवरण |
| तेज़ दर्द |
गंभीर, कम समय का दर्द, स्वयं कम हो जाने वाला |
| चिरकालिक दर्द |
लगातार, स्वयं कम न होने वाला |
| तंत्रिकाओं से संबंधित दर्द |
जलन वाला, बिजली की तरह करंट मारने वाला, एक जगह से तेज़ी से बढ़ने वाला, झुनझुनी वाला |
| मस्तिष्क के उद्दीपनों से संबंधित दर्द |
तीक्ष्ण, पूरे शरीर का, टपकन वाला, एक ही जगह पर केन्द्रित |
रीढ़ की हड्डी की बीमारियों के कारण होने वाले दर्द और तकलीफ़ के इलाज में प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के नर्व ब्लॉक्स और एपिड्यूरल इंजेक्शनों का संक्षिप्त परिचय नीचे दिया जा रहा है।
नर्व ब्लॉक्स नर्व ब्लॉक्स दवा का वह इंजेक्शन है जो तंत्रिकाओं में या उसके पास दिया जाता है। इंजेक्शन से दी जाने वाली दवा में लोकल एनीस्थेटिक, स्टीरॉयड और नशे की दवा शामिल हो सकती है।
- फेसेट जोड़ ब्लॉक और मीडियल ब्लॉक
रीढ़ की हड्डियों के बीच के जोड़ की सूजन से पीठ में दर्द हो सकता है। फेसेट जोड़ ब्लॉक में जोड़ों के अंदर लोकल एनीस्थेटिक और स्टीरॉयड दवा का इंजेक्शन लगाया जाता है। मीडियल ब्लॉक में उसी तरह की दवाओं का इंजेक्शन जोड़ के बाहर उस तक संवेदना का प्रवाह करने वाली तंत्रिका के पास की जगह पर लगाया जाता है।
- परिसरीय नर्व ब्लॉक
पैरिस्थीसिया वे संवेदनायें हैं जिन्हें सुन्न पड़ना, झुनझुनी होना, या ‘सो जाना’ कहा जाता है। ये अनुभूतियाँ परिसरीय तंत्रिका-तंत्र से बाहर के हिस्से की गड़बड़ियों के कारण होती हैं। मस्तिष्क और सुषुम्ना से निकलने वाली तंत्रिकाओं के अलावा अन्य तंत्रिकाओं को परिसरीय नर्व कहते हैं। संवेदनावाहक परिसरीय तंत्रिकायें केन्द्रीय तंत्रिका-तंत्र को सूचनायें प्रेषित करती हैं। मोटर परिसरीय तंत्रिकायें मस्तिष्क से सूचनायें ले जाती हैं।
- सेलेक्टिव नर्व रूट ब्लॉक (SNRB)
सर्वाइकल या लम्बर रेडिकुलोपैथी से होने वाले दर्द या तकलीफ़ में SNRB से राहत मिल सकती है। रेडिकुलोपैथी शरीर के किसी खास अंग (जैसे बाँह, टाँग) को जाने वाली तंत्रिका के मूल में जलन और सूजन को कहते हैं।
- सिम्पैथेटिक नर्व ब्लॉक
सिम्पैथेटिक तंत्रिकायें स्वसंचालित तंत्रिका-तंत्र के कुछ हिस्सों को नियंत्रित करती हैं। इसमें पसीना आने और रक्त संचार जैसी शारीरिक क्रियायें शामिल होती हैं। पुराने दर्द के कारण बीमारियाँ अक्सर सिम्पैथेटिक तंत्रिकाओं से जुड़ी होती हैं।
- एपिड्यूरल स्टीरॉयड इंजेक्शन
एपिड्यूरल स्पेस सुषुम्ना और तंत्रिका मूलों को ढँकने वाली मेम्ब्रेन के आसपास का स्थान होता है। स्पाइनल स्टेनोसिस और हर्नियेटेड डिस्क जैसी बीमारियों से तंत्रिकाओं में जलन, सूजन और दर्द हो सकता है। एपिड्यूरल इंजेक्शन से एपिड्यूरल स्थान में सूजन-रोधक (जैसे स्टीरॉयड) दवा दी जाती है। एपिड्यूरल इंजेक्शन रीढ़ की हड्डी के सर्वाइकल, थोरैसिक और लम्बर हिस्सों में लगाये जाते हैं।
- सैक्रोइलियाक जोड़ इंजेक्शन
सैक्रोइलियक जोड़ शरीर का सबसे बड़ा जोड़ है। यह रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में टेलबोन के ऊपर होता है। सैक्रोइलियक जोड़ की सूजन से पीठ के निचले हिस्से और नितंबों में दर्द हो सकता है। एनीस्थेटिक और स्टीरॉयड के इंजेक्शन से जोड़ के दर्द से राहत मिलती है।
- रेडियोफ़्रीक्वेंसी नर्व एब्लेशन
फेसेट जोड़ भी पीठ की दर्द का एक कारण होते हैं। रेडियोफ़्रीक्वेंसी नर्व एब्लेशन में फेसेट जोड़ की किसी विशिष्ट तंत्रिका को केन्द्रित कर रेडियो तरंगें भेजी जाती हैं, जिससे गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी से तंत्रिका नष्ट हो जाती है और दर्द से राहत मिलती है।
एब्लेशन की प्रक्रिया भी नर्व ब्लॉक या जोड़ों के इंजेक्शन की ही तरह होती है, अंतर केवल इतना है कि इसमें शरीर के अंदर दो सुइयाँ प्रविष्ट कराई जाती हैं; प्रत्येक फेसेट जोड़ में दो तंत्रिकायें होती हैं। हर सुई को सही स्थान तक पहुँचाने के लिए फ़्लूरोस्कोपिक निर्देशन से काम लिया जाता है। इसके बाद रेडियोफ़्रीक्वेंसी “रेडियो तरंगें” दोनों सुइयों के ज़रिये भेजी जाती हैं। एब्लेशन की प्रक्रिया में लगभग दो मिनट का समय लगता है। पूरी प्रक्रिया में लगभग दो घंटे लगते हैं।
मरीज़ों पर प्रतिबंध सुरक्षा की दृष्टि से, कुछ मरीज़ों को स्पाइनल इंजेक्शन लेने की अनुमति निम्न कारणों से नहीं दी जातीः
- इंजेक्शन से दी जाने वाली दवाओं से अलर्जी
- एनीमिया (रक्ताल्पता)
- दमा
- खून बहने संबंधी समस्यायें
- संक्रमण
- गुर्दे की बीमारी
- गर्भावस्था/स्तन-पान कराने के समय
- रीढ़ की हड्डी की गंभीर असामान्यता
मरीज़ों की तैयारीः घर पर जाँच-पूर्व के सभी निर्देशों का पालन आवश्यक है। इन निर्देशों में प्रायः शामिल होते हैं:
- जाँच से 2 दिन पूर्व खून को पतला करने वाली दवायें लेनी बंद कर दें
- जाँच से 5 दिन पहले से एस्पिरिन वाली दवायें न लें
- जाँच से 5 दिन पहले से सूजन रोधी दवायें लेना बंद कर दें (VioxxT या CelebrexT इसका अपवाद हैं)
- जाँच के 8 घंटे पहले से दर्द की दवा लेना बंद कर दें
- जाँच के 6 घंटे पहले से कुछ खायें-पियें नहीं
- घर वापस आने के लिए किसी व्यक्ति से परिवहन की व्यवस्था करने को कहें
मरीज़ों की तैयारीः चिकित्सा सुविधा केन्द्र में
- चिकित्सा कर्मचारी मरीज़ की पृष्ठभूमि, बीमारी, रोज़ ली जाने वाली दवाओं, भोजन तथा/अथवा दवाओं से अलर्जी, और अन्य सूचनाओं की समीक्षा करेंगे।
- मरीज़ कपड़े बदलकर गाउन पहनता है और अस्पताल के बेड पर लेट जाता है। अस्पताल मरीज़ की व्यक्तिगत वस्तुओं को रखने के लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराता है।
- मरीज़ को EKG मॉनिटर (हृदय की गतिविधियों के लिए), स्वचालित ब्लड प्रेशर कफ़ (रक्तचाप नापने के लिए), और ऑक्सीमीटर (रक्त में ऑक्सीजन के स्तर को नापने के लिए) लगा दिये जाते हैं। इन उपकरणों से चिकित्सा कर्मचारी ऑपरेशन से पहले, उस दौरान और बाद में मरीज़ के जीवन लक्षणों पर लगातार निगरानी रख सकते हैं।
- मरीज़ को चैन से रखने के लिए इंजेक्शन से दवा दे दी जाती है। कुछ मामलों में, इंट्रावीनस इंजेक्शन के ज़रिये नशे की हल्की दवा भी दी जा सकती है।
प्रक्रिया के दौरान क्या उम्मीद रखें
- यह प्रक्रिया ऑपरेशन रूम जैसे कीटाणुरहित परिवेश में पूरी की जाती है।
- इंजेक्शन की जगह को साफ़ किया जाता है और ढक दिया जाता है। उस जगह और उसके आसपास की त्वचा को सुन्न करने वाली दवा का इंजेक्शन लगाया जाता है।
- आगे बढ़ने से पहले, फ़्लूरोस्कोपी सी-आर्म मरीज़ के ऊपर ले जाई जाती है। फ़्लूरोस्कोपी निर्देश का प्रयोग, प्रक्रिया के दौरान सुई को सही स्थान तक ले जाने के लिए किया जाता है।
- सुई के ठीक जगह पहुँचने के बाद एनीस्थेटिक और स्टीरॉयड के इंजेक्शन लगाये जाते हैं। संक्रमण से बचाव के लिए इंजेक्शन में एंटीबायोटिक को भी शामिल किया जा सकता है।
जाँच प्रक्रिया के बाद
- मरीज़ को स्ट्रेचर से रिकवरी क्षेत्र में ले जाया जाता है, जहाँ चिकित्साकर्मी उसके जीवन लक्षणों पर निगरानी रखना जारी रखते हैं।
- मरीज़ की स्थिति ठीक हो जाने के बाद उसे लिखित निर्देश देकर घर जाने दिया जाता है।
- इंजेक्शन दिये जाने की जगह के आसपास का हिस्सा सुन्न रहता है।
- स्टीरॉयड के कुछ अनुषंगी प्रभाव भी हो सकते हैं, जिनमें धुँधला दिखाई देना, बार-बार पेशाब आना, प्यास अधिक लगना और रक्त में चीनी का स्तर बढ़ जाना शामिल है। यदि ये अनुषंगी प्रभाव तकलीफ़देह हो जायें या बिगड़ जायें तो, चिकित्सक से संपर्क करें।
- यदि बुखार, कँपकँपी, दर्द बढ़ना, कमजोरी या मल/मूत्र त्याग में रुकावट के लक्षण प्रकट होने लगें तो तत्काल चिकित्सा सहायता लें।
- इलाज कर रहे चिकित्सक के साथ फ़ॉलो-अप।
संभावित जटिलतायें रीढ़ की हड्डी में दिये जाने वाले इंजेक्शनों में भी, अन्य चिकित्सा प्रक्रियाओं की तरह जोखिम रहता है। इसकी जटिलताओं में शामिल हैं संक्रमण का ख़तरा, निम्न रक्तचाप, सरदर्द, और तंत्रिका ऊतकों को नुकसान।
निष्कर्ष हम ऊपर दी गई सभी थेरेपीज़ उपलब्ध कराते हैं। हमारा चिकित्सा दल आपके साथ विकल्पों के बारे में सावधानी से चर्चा करेगा और प्रक्रिया से पहले और बाद के लिए विस्तृत निर्देश देगा।
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