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स्पोंडिलोलिस्थीसिस – इस्थमिक
स्पोंडिलोलिस्थीसिस रीढ़ की हड्डी की अस्थिरता का एक रोग है, जिसमें एक कशेरुका, नीचे वाले कशेरुका के ऊपर चढ़ जाती है। इस्थमिक स्पोंडिलोलिस्थीसिस, इस रोग का सबसे आम प्रकार है। यह कशेरुका के ढाँचे की छत (लैमीनी) में स्थित हिस्से में हड्डी के किसी विकार (या फ्रैक्चर) के कारण होती है।
हड्डी का यह विकार जनसंख्या के लगभग 4% लोगों में पाया जाता है, और हड्डी के गठन में वंशानुगत असमर्थता के कारण होता है। इस रोग में सामान्यतः चौथी और पाँचवी लम्बर कशेरुकायें (L4 तथा L5) तथा पहली सैक्रल कशेरुका (S1) प्रभावित होती है। यह बात दिलचस्प है कि इस रोग में हमेशा दर्द होना ज़रूरी नहीं है।
लक्षण इस्थमिक स्पोंडिलोलिस्थीसिस के लक्षणों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:
- पीठ के निचले हिस्से, जाँघों तथा/अथवा टाँगों में दर्द – यह ख़ास तौर पर व्यायाम के बाद होता है – जो नितम्बों में भी फैल जाता है।
- पेशियों में ऐंठन
- टाँगों में दर्द या कमज़ोरी
- पिडंली की पेशियों में कसाव
- असमान चाल
कुछ लोगों में इनमें से कोई भी लक्षण नहीं पाये जाते और इनकी बीमारी का पता केवल तब लगता है, जब वे किसी और बीमारी के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं। बहुत गंभीर मामलों में, इस रोग के कारण कुबड़ापन और बाहर निकला हुआ पेट, धड़ का छोटा रह जाना और बत्तख जैसी डगमगाती चाल जैसे लक्षण प्रकट हो सकते हैं।
इस्थमिक स्पोंडिलोलिस्थीसिस किस कारण से हो सकती है? इस्थमिक स्पोंडिलोलिस्थीसिस रीढ़ की हड्डी की कशेरुकाओं के गठन में वंशानुगत असमर्थता के कारण हो सकती है। आम तौर पर रीढ़ की हड्डी पर ज़ोर पड़ने से कशेरुकाओं के कमज़ोर या पूरी तरह न बने हिस्से टूट जाते हैं। बार-बार भारी सामान उठाने, झुकने या घूमने से कशेरुका के ढाँचे में छोटे-छोटे फ्रैक्चर होते रहते हैं जिनकी वजह से एक कशेरुका दूसरी के ऊपर चढ़ जाती है। वेटलिफ़्टर, फुटबॉल खिलाड़ी, और जिमनास्ट अक्सर इस रोग से पीड़ित होते हैं क्योंकि उनकी रीढ़ की हड्डी पर ज़्यादा ज़ोर पड़ता है।
निदान सही निदान के लिए, डॉ. लोनर सावधानी के साथ कठिन निदानात्मक प्रक्रिया करते हैं, जिसमें शामिल हैः
- चिकित्सीय पृष्ठभूमि। चिकित्सक आपके लक्षणों के बारे में आपसे बात करेंगे, कि वे कितने गंभीर हैं और आपने अब तक कौन-कौन से उपचार किये हैं।
- शारीरिक जाँच। गतिशीलता की सीमाओं, संतुलन की समस्याओं, और दर्द का पता लगाने के लिए आपकी सावधानी से जाँच की जायेगी। इस जाँच के दौरान, डॉक्टर शरीर के छोरों (हाथों और पैरों) के रिफ़्लेक्स (प्रतिवर्त) की कमी, पेशियों की कमज़ोरी, संवेदना की कमी या तंत्रिकाओं के नुकसान के अन्य लक्षणों पर भी ध्यान देंगे।
- निदानात्मक परीक्षण। आम तौर पर, शुरुआत सादे एक्स-रे से की जाती है, ताकि यह स्पष्ट हो जाये कि ट्यूमर और संक्रमण जैसी अन्य समस्यायें तो नहीं हैं। निदान की पुष्टि करने के लिए हम CT स्कैन या MRI भी कर सकते हैं। कुछ मरीज़ों का मायलोग्राम कराने की ज़रूरत पड़ सकती है। इस परीक्षण में तरल डाई का प्रयोग किया जाता है। इस डाई को स्पाइनल कॉलम में इंजेक्ट करके पता लगाया जाता है कि तंत्रिकाओं पर कितना दबाव पड़ रहा है और संबंधित कशेरुकायें एक-दूसरे से कितनी दूर या पास हैं।
स्पोंडिलोलिस्थीसिस का वर्गीकरण कशेरुकाओं के फिस्लाव (स्लिपेज) का स्तर कम है या बहुत गंभीर, इसका आकलन या “वर्गीकरण” करने के लिए कई तरीके प्रयोग में लाये जाते हैं। आपके सर्जन आपको बतायेंगे कि आपकी स्पोंडिलोलिस्थीसिस कितनी गंभीर है और उसी के आधार पर तय किया जाता है कि आपको किस प्रकार के इलाज की ज़रूरत है। आम तौर पर, अधिकांश चिकित्सक फिसलाव के वर्गीकरण के लिए मेयर्डिंग ग्रेडिंग सिस्टम का प्रयोग करते हैं। इस प्रणाली को समझना अपेक्षाकृत सरल है। फिसलाव का वर्गीकरण इस आधार पर किया जाता है कि एक कशेरुका अपने नीचे वाली कशेरुका के ऊपर कितने प्रतिशत तक खिसक गई है। इस तरह प्रथम श्रेणी (ग्रेड I) स्लिप का मतलब है कि कशेरुका का 1-24% हिस्सा नीचे वाली कशेरुका के ऊपर से खिसक गया है। द्वितीय श्रेणी (ग्रेड II) से 25-49% खिसकने का पता चलता है। तृतीय श्रेणी (ग्रेड III) से 50-74% खिसकने का और चतुर्थ श्रेणी (ग्रेड IV) से 75-99% खिसकने का संकेत मिलता है। अगर कशेरुका नीचे वाली कशेरुका के ऊपर से पूरी तरह खिसककर अलग हो चुकी है तो उसे पाँचवीं श्रेणी (ग्रेड V) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, और इसे स्पोंडिलोलिस्थीसिस कहा जाता है।
डॉ. लोनर सबसे उपयुक्त इलाज का फ़ैसला करते समय खिसकने की श्रेणी, और असाध्य दर्द और तंत्रिका-तंत्र के लक्षण जैसे तत्त्वों पर विचार करते हैं। सामान्यतः अधिक गंभीर खिसकाव (विशेष रूप से ग्रेड III और उससे ऊपर) के मामलों में सर्जिकल हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ने की सबसे अधिक संभावना रहती है।
ग़ैर-ऑपरेशन उपचार इस्थमिक स्पोंडिलोलिस्थीसिस के अधिकांश मामलों (विशेष रूप से ग्रेड I और ग्रेड II) के इलाज में थोड़े समय के लिए बेड रेस्ट एवं लक्षणों की शुरुआत का कारण बनने वाली गतिविधियों, दर्द/सूजन निवारक दवाओं, स्टीरॉयड-एनीस्थेटिक इंजेक्शन, फ़िज़िकल थेरेपी तथा/अथवा स्पाइनल ब्रेसिंग पर प्रतिबंध शामिल हैं।
सर्जिकल उपचार सर्जरी की बहुत कम आवश्यकता पड़ती है, इसका सहारा तभी लिया जाता है जब मामला गंभीर (सामान्यतः ग्रेड III और अधिक) हो, तंत्रिका-तंत्र को नुकसान हो चुका हो, असाध्य दर्द हो और सभी ग़ैर-ऑपरेशन विकल्प विफल हो चुके हों।
स्पोंडिलोलिस्थीसिस के इलाज में काम आने वाली सबसे आम सर्जिकल प्रक्रिया है लैमिनेक्टॉमी और संयोजन । इस प्रक्रिया में, कशेरुका की छत (लैमीनी) को हटाकर या काट-छाँटकर स्पाइनल कैनाल को चौड़ा किया जाता है। यह तंत्रिकाओं के लिए अधिक जगह बनाने और सुषुम्ना पर पड़ रहे दबाव को कम करने के लिए किया जाता है। हो सकता है कि सर्जन को कशेरुका चक्रिका को पूरी तरह या आंशिक रूप से हटाने (डिस्केक्टॉमी) और उसके बाद कशेरुकाओं को आपस में संयोजित करने की भी ज़रूरत पड़े। यदि संयोजन किया जाता है, तो उसे बढ़ावा देने और अस्थिर रीढ़ की हड्डी को सहारा देने के लिए शरीर के भीतर विभिन्न उपकरण (जैसे पेंच या पिंजरे) भी लगाये जा सकते हैं।
इस्थमिक स्पोंडिलोलिस्थीसिस के मामले का उदाहरण


इस किशोर उम्र बालिका को L5/S1 की उच्च श्रेणी की स्पोंडिलोलिस्थीसिस थी। ऑपरेशन से पूर्व के एक्स-रे और MRI से इसकी स्लिप की गंभीरता का पता चलता है। इस स्लिप को पीछे की ओर से ऑपरेशन कर, संयोजन और उपकरण द्वारा दुरुस्त किया गया। इस मरीज़ की सर्जरी को 4 वर्ष हो चुके हैं तथा यह सक्रिय है और इसे पीठ का दर्द भी नहीं है।
बचाव ही स्वस्थ रहने की कुंजी है रीढ़ की हड्डी की सभी समस्याओं से बचना भले ही सभंव न हो, लेकिन बहुत सी ऐसी बातें हैं, जिनसे आप उसे स्वस्थ रहने में मदद दे सकते हैं। बचाव का सबसे महत्त्वपूर्ण तरीका यह है कि आप ऐसा कोई काम या मनोरंजन गतिविधि न करें या उन्हें कम से कम करें, जिनसे आपकी रीढ़ की हड्डी पर ज़ोर पड़ता हो। वज़न कम करने, नियमित व्यायाम का कार्यक्रम शुरू करने, धूम्रपान न करने और सही शारीरिक मैकेनिक्स (मुद्रायें) सीखने से पीठ की समस्याओं का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
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