कम से कम चीरे वाली स्पाइन (रीढ़ की हड्डी) सर्जरी

कई वर्षों तक, पारपंरिक स्पाइन सर्जरी में आम तौर पर पीठ के बीच में, ऊपर, और नीचे बड़े चीरे लगाये जाते थे और रीढ़ की हड्डी तक पहुँचने के लिए पीठ की पेशियों को अलग दिशाओं में फैलाया (या खींचा) जाता था। इसे आम भाषा में “खुली” तकनीक कहा जाता है। खुली तकनीक का लाभ यह है कि बड़े चीरे के कारण सर्जन को रीढ़ की हड्डी तक पहुँचने में आसानी होती है। “खुली” सर्जरी की ख़ामी यह है कि पेशियों को खींचने से रीढ़ की हड्डी की पेशियों को नुकसान पहुँचता है और ऑपरेशन के बाद काफ़ी दर्द रहता है। इसके अलावा, इस सर्जरी में काफ़ी खून बह जाता है, बड़ा निशान रह जाता है और मरीज़ को ठीक होने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है।

हालाँकि कई मामलों में अब भी “खुली” तकनीक ही बेहतर समझी जाती है लेकिन अब अधिक से अधिक बीमारियों के लिए न्यूनतम चीरे वाली स्पाइन सर्जरी नामक नई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

न्यूनतम चीरे वाली स्पाइन सर्जरी क्या है?
जैसा कि नाम से ही पता चलता है, न्यूनतम चीरे वाली स्पाइन सर्जरी में सर्जन को त्वचा पर छोटे चीरे लगाने होते हैं और पेशियों को बड़े पैमाने पर खींचने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सर्जन टेलीस्कोप-जैसे एक पतले उपकरण का प्रयोग करते हैं, जिसे एंडोस्कोप कहा जाता है और जो एक छोटा-सा चीरा लगाकर शरीर में प्रविष्ट कराया जाता है। एंडोस्कोप में एक छोटा वीडियो कैमरा और लाइट लगी होती है, जो शरीर के “भीतर” के चित्र ऑपरेशन रूम के स्क्रीन पर भेजते हैं। इसके बाद अन्य छोटे चीरों से छोटे ट्यूब अंदर प्रविष्ट कराये जाते हैं। इन ट्यूब्स के ज़रिये विशेष सर्जिकल उपकरण अंदर भेजे जाते हैं, जिनका इस्तेमाल ऑपरेशन में किया जाता है।

न्यूनतम चीरे वाली तकनीकों के फ़ायदे
न्यूनतम चीरे वाली स्पाइन सर्जरी के भी प्रायः वैसे ही नतीजे मिलते हैं जो पारपंरिक तकनीकों से प्राप्त होते हैं। लेकिन, न्यूनतम चीरे वाली तकनीकों के अन्य अनेक लाभ भी हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • ऑपरेशन में कम समय लगना।
  • पेशियों को कम खींचना पड़ता है, अतः कोमल ऊतकों को कम नुकसान पहुँचता है।
  • सर्जरी के चीरों से कम दर्द होता है।
  • खून कम बहता है।
  • मरीज़ जल्दी ठीक होता है और ऑपरेशन के बाद कम दर्द होता है।
  • अस्पताल में कम समय रहना पड़ता है।
  • चूँकि चीरे छोटे होते हैं इसलिए निशान भी हल्का होता है, जो देखने में बेहतर लगता है।

न्यूनतम चीरे वाली तकनीकों का उपयोग
हमारी संस्था में हमारी प्राथमिकता है अपने मरीज़ों को सर्वोत्तम देखभाल उपलब्ध कराना। इसी कारण, हम उन्हीं न्यूनतम चीरे वाली तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं जो हमारी समझ के अनुसार वैज्ञानिक दृष्टि से उपयुक्त साबित हो चुकी हैं, लेकिन उन तकनीकों का इस्तेमाल नहीं करते जो उचित साबित नहीं हुई हैं या किसी विशेष समस्या के लिए उपयुक्त नहीं है। हम जिन न्यूनतम चीरे वाली तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, उनमें शामिल हैं:

  • डिस्केक्टॉमी – जिसमें कशेरुकाओं के बीच की चक्रिकायें हटा दी जाती हैं। अपनी संस्था में हम अनेक डिस्केक्टॉमी न्यूनतम चीरे वाली तकनीक से करते हैं, जिनमें रीढ़ की हड्डी तक पहुँचने और डिस्केक्टॉमी करने के लिए छोटे चीरे लगाये जाते हैं।
  • एटीरियर लम्बर इंटरबॉडी फ़्यूज़न (ALIF)। ALIF ऑपरेशन के पारपंरिक तरीके में कोमल ऊतकों को ख़ासा नुकसान होता है और खून भी अधिक बहता है। हम ALIF के लिए मिनी-चीरे वाला तरीका काम में लाते हैं। इस तरीके में पारपंरिक तरीके की अपेक्षा बहुत कम चीरे लगाये जाते हैं, और यह लैपरोस्कोपिक तकनीक से अधिक सुरक्षित भी है
  • पोस्टीरियर लम्बर इंटरबॉडी फ़्यूज़न (PLIF)। स्पोंडिलोलिस्थीसिस और डीजेनेरेटिव डिस्क डिज़ीज़ जैसी बीमारियों के लिए हम मिनी चीरे वाली PLIF तकनीक का प्रयोग करते हैं। वस्तुतः हमने इस तकनीक के लिए जो रिट्रैक्टर प्रणाली विकसित की है, अब उसका प्रयोग पूरे अमरीका के स्पाइन सर्जन करते हैं।
  • पेडीकल स्क्रू – कुछ समय पूर्व तक पेडीकल स्क्रू प्रविष्ट कराते समय सर्जन को पेडीकल को खोलने की ज़रूरत पड़ती थी। आज, हम विभिन्न तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए पेडीकल स्क्रू केवल त्वचा के ज़रिये लगा सकते हैं। इस क्रिया में पेशियों और टैडन्स (कण्डराओं) को छूना भी नहीं पड़ता।
  • वर्टीब्रोप्लास्टी और काइफ़ोप्लास्टी – इन अपेक्षाकृत नई तकनीकों का इस्तेमाल कशेरुकाओं पर दबाव के कारण हुए फ्रैक्चर के इलाज के लिए किया जाता है। इसमें प्रभावित कशेरुका में हड्डी को जोड़ने वाली सीमेंट इंजेक्ट की जाती है। हमें इन तकनीकों के प्रयोग का काफ़ी अनुभव है और उनसे प्राप्त परिणाम बहुत ही अच्छे हैं।

निष्कर्ष
हम नई तकनीक केवल तभी अपनाते हैं, जब उसकी सुरक्षा और गुणवत्ता स्पष्ट रूप से साबित हो चुकी होती है। लेकिन, एक बार ऐसे सबूत मिल जाने के बाद हम अपने मरीज़ों के लाभ के लिए इन प्रौद्योगिकियों और तकनीकों को अपनाने में सबसे आगे रहते हैं। डॉ. लोनर, स्कोलियोसिस के मरीज़ों की देखभाल के लिए न्यूनतम चीरे वाली तकनीकें उपलब्ध कराने के क्षेत्र में अग्रणी हैं। अधिक जानकारी के लिए, नीचे दी गई लिंक्स पर क्लिक करें।

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