


न्यूरोमस्क्युलर स्कोलियोसिसन्यूरोमस्क्युलर स्कोलियोसिस रीढ़ की हड्डी का पार्श्व की ओर झुकाव है, जो तंत्रिका और पेशियों की विभिन्न बीमारियों के कारण होता है। इनमें शामिल हैं, मस्तिष्क का पक्षाघात, पेशियों का सूखते जाना, पोलियो, रीढ़ की हड्डी की पेशियों का अपक्षय, और सुषुम्ना में चोट लगने के बाद होने वाले रोग तथा कई अन्य बीमारियाँ। इन बीमारियों से पीड़ित मरीज़ों को अक्सर स्कोलियोसिस तथा/अथवा काइफ़ोसिस या कूबड़ हो जाता है। इसके साथ अक्सर पीठ का दर्द, व्हीलचेयर में बैठने में कठिनाई, और चलने की स्वाभाविक क्षमता ख़त्म होने जैसे लक्षण जुड़े रहते हैं। जिन लोगों में इस रोग का गंभीर असर होता है उनके फेफड़ों के काम करने में बार-बार निमोनिया या ब्रॉन्काइटिस होने या फिर थोरैक्स के संकुचित होने से बाधा आ जाती है। कुछ मरीज़ों को बौद्धिक विकास रुक जाने के कारण विशेष आवश्यकतायें होती हैं। मस्तिष्क पक्षाघात जैसे रोगों में इस तरह की आवश्यकतायें अक्सर महसूस की जाती हैं। न्यूरोमस्क्युलर स्कोलियोसिस के मरीज़ों का इलाज उनकी विशिष्ट समस्या (जैसे दर्द, बैठने में कठिनाई) और झुकाव की स्थिति तथा गंभीरता को देखते हुए तय किया जाता है। जिन मरीज़ों के झुकाव 50 डिग्री से कम और लचीले होते हैं, उनके ग़ैर-ऑपरेशन इलाज में ब्रेसिंग भी शामिल है। जो बिलकुल चल-फिर नहीं सकते, उन्हें बैठने में आराम और संतुलन देने के लिए व्हीलचेयर में परिवर्तन किया जा सकता है। सर्जिकल इलाज उन लोगों के लिए है, जिनका झुकाव और बढ़ने की संभावना है तथा जो उनके कामकाज में बाधा डालता है या फिर आने वाले वर्षों में उससे कठिनाई उत्पन्न होने का डर है। पेशियों के सूखने के मरीज़ों का इलाज तब किया जाता है, जब उनका झुकाव 20 डिग्री या उससे अधिक हो जाये। जल्दी सर्जरी तभी की जाती है जब फेफड़ों के काम करने और रोगी के चलने-फिरने की क्षमता बचानी हो। सामान्यतः अधिकतर मरीज़ों की सर्जरी झुकाव के 50 डिग्री से अधिक होने पर ही की जाती है। अक्सर, जब श्रोणि की असमानता या टेढ़ापन गंभीर झुकाव के साथ हो, तब सर्जरी में रीढ़ की हड्डी और श्रोणि दोनों को शामिल किया जाता है ताकि श्रोणि का टेढ़ापन और रीढ़ की हड्डी का असंतुलन ठीक किया जा सके। ऐसा पीछे से (पोस्टीरियर) या आगे और पीछे से (एन्टीरियर तथा पोस्टीरियर) की जाने वाली संयुक्त शल्यचिकित्सा प्रक्रिया द्वारा किया जा सकता है। यह झुकाव की गंभीरता और रीढ़ की हड्डी को सामने से अतिरिक्त सहारा देने की आवश्यकता पर निर्भर करता है। इन मरीज़ों के इलाज की सफलता, रीढ़ की हड्डी को पुनः संतुलित करने की उनकी क्षमता एवं मरीज़ की गतिविधियों, आरामदायक ज़िंदगी की वापसी और अपने परिवेश तथा परिवार के साथ उसके सार्थक जीवन के आधार पर आँकी जाती है। हालाँकि इनमें से बहुत से मरीज़ काफ़ी हद तक अक्षम हो चुके होते हैं, फिर भी वे अक्सर संपूर्ण और सफल जीवन जीने में सक्षम हो जाते हैं। मामले के उदाहरण
यह एक 19 वर्षीय बालक है जिसे मस्तिष्क का पक्षाघात है और 70 डिग्री की स्कोलियोसिस भी हो गई है। इसका इलाज थोरैकोस्कोपिक स्पाइनल फ़्यूज़न और पोस्टीरियर इंस्ट्रुमेंटेशन के ज़रिये पेंच-तार लगाकर किया गया। इसके झुकाव को दुरुस्त कर 15 डिग्री से कम कर दिया गया। सर्जरी के बाद इसकी चलने की क्षमता में सुधार हुआ।
जल्दी होने वाली स्कोलियोसिस |
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