PLIF,ALIF और TLIF प्रक्रियायें
रीढ़ की हड्डी का संयोजन एक सर्जिकल प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक कशेरुकाओं को आपस में जोड़ा या संयोजित कर दिया जाता है। संयोजन (फ़्यूज़न) सर्जरी में सामान्यतः संयोजन को आसान बनाने के लिए हड्डी के ग्राफ़्ट के प्रयोग की ज़रूरत पड़ती है। इसके लिए मरीज़ की श्रोणि की हड्डी (ऑटोग्राफ़्ट) से, या किसी अन्य व्यक्ति के शरीर से (एलोग्राफ़्ट) हड्डी के छोटे टुकड़े लिए जाते हैं, और उन्हें कशेरुकाओं के बीच “पैक” कर दिया जाता है ताकि वे आपस में जुड़ जायें। यह हड्डी का ग्राफ़्ट, और एक बायोमैकेनिकल स्पेसर इम्प्लांट, कशेरुकाओं के बीच की चक्रिका की जगह लेते हैं, जो इस प्रक्रिया में पूरी तरह निकाल दी जाती है। रीढ़ की हड्डी का संयोजन (स्पाइनल फ़्यूज़न) सर्जरी रीढ़ की हड्डी की बीमारियों, जैसे स्पोंडिलोलिस्थीसिस, स्कोलियोसिस, गंभीर डिस्क डीजेनेरेशन, या स्पाइनल फ्रैक्चर के लिए आम इलाज है। संयोजन (फ़्यूज़न) सर्जरी के बारे में आम तौर पर तभी विचार किया जाता है, जब व्यापक स्तर पर किए गए ग़ैर-ऑपरेशन इलाज असफल हो चुके हों। हमारी संस्था में आम तौर पर तीन प्रकार की फ़्यूज़न सर्जरी की जाती हैं PLIF, ALIF और TLIF।
PLIF PLIF का मतलब है पोस्टीरियर लम्बर इंटरबॉडी फ़्यूज़न। इस फ़्यूज़न तकनीक में कशेरुकाओं तक पहुँचने के लिए मरीज़ की पीठ (पोस्टीरियर) में चीरा लगाया जाता है। PLIF प्रक्रिया के तीन बुनियादी चरण होते हैं:
- ऑपरेशन से पहले योजना बनाना और तैयारी करना। सर्जरी से पहले, सर्जन MRI और CAT स्कैन्स कराके पता लगाते हैं कि मरीज़ को कितने बड़े इम्प्लांट की जरूरत पड़ेगी।
- डिस्क स्पेस तैयार करना। कितने स्तरों पर संयोजन (फ़्यूज़न) किया जाना है, इसके आधार पर मरीज़ की पीठ में 3-6 इंच का चीरा लगाया जाता है और रीढ़ की हड्डी की मांसपेशियों को कशेरुकाओं की चक्रिका तक पहुँचने के लिए खींचा जाता है (या अलग किया जाता है)। इसके बाद सर्जन सावधानी से फलक को निकाल देते हैं (लैमिनेक्टॉमी) ताकि तंत्रिका मूलों को देखा और उन तक पहुँचा जा सके। तंत्रिका मूलों के ठीक ऊपर स्थित फेसेट जोड़ों की भी काट-छाँट करनी पड़ सकती है ताकि तंत्रिका मूलों के लिए ज़्यादा जगह बनाई जा सके। इसके बाद सर्जन प्रभावित चक्रिका और आसपास के ऊतकों को निकाल देते हैं और उसके पास की कशेरुकाओं की हड्डी की सतह को संयोजन के लिए तैयार करते हैं।
- इम्प्लांट्स लगाना (निरोपण)। एक बार चक्रिका की खाली जगह बन जाने के बाद हड्डी के ग्राफ़्ट, एलोग्राफ़्ट या पिंजरे सहित BMP को उस जगह लगा दिया जाता है ताकि दो कशेरुकाओं के बीच संयोजन को मदद मिल सके। इस समय, रीढ़ की हड्डी को और अधिक स्थिरता प्रदान करने के लिए अतिरिक्त उपकरणों (जैसे कि रॉड्स या पेंचों) का भी प्रयोग किया जा सकता है।
TLIF TLIF का मतलब है ट्रांसफ़ॉर्माइनल लम्बर इंटरबॉडी फ़्यूज़न। यह फ़्यूज़न सर्जरी PLIF प्रक्रिया का परिष्कृत रूप है और लम्बर स्पाइन से जुड़ी बीमारियों के सर्जिकल इलाज के लिए हाल के दिनों में लोकप्रिय हुई है। TLIF तकनीक में भी PLIF प्रक्रिया की तरह रीढ़ की हड्डी तक पहुँच बनाई जाती है लेकिन इसमें कशेरुका दण्ड के नाल (स्पाइनल कैनाल) की तरफ से अधिक शल्यक्रिया होती है और इसके लिए मरीज़ की पीठ में ठीक बीच वाली रेखा पर चीरा लगाया जाता है। इस तरीके से पेशियों को बहुत कम काटना पड़ता है और कशेरुकाओं, चक्रिकाओं तथा तंत्रिकाओं तक पहुँचने के लिए तंत्रिकाओं को कम से कम छेड़ना पड़ता है। हमारी संस्था में शरीर के भीतर संयोजन के लिए TLIF तरीका ज़्यादा पसंद किया जाता है क्योंकि इसमें रीढ़ की हड्डी को कम आघात पहुँचता है, यह तंत्रिकाओं के लिए भी सुरक्षित है और इसमें स्पाइनल फ़्यूज़न के लिए एंडोस्कोपिक तकनीकों के प्रयोग की गुंजाइश होने के साथ ही कम से कम चीरे लगाने की ज़रूरत पड़ती है।
जैसा कि PLIF और ALIF में होता है, इसमें भी रीढ़ की हड्डी से चक्रिका सामग्री निकाल दी जाती है और उसकी खाली जगह पर हड्डी का ग्राफ़्ट (साथ में ज़रूरी होने पर पिंजरे, पेच, या रॉड्स भी) लगा दिया जाता है। इन उपकरणों को लगाने से संयोजन में आसानी होती है और रीढ़ की हड्डी को मज़बूती और स्थिरता मिलती है। आजकल हम पिंजरों के लिए अनेक अत्याधुनिक तकनीकें प्रयोग में लाते हैं, जिनमें हड्डी, टाइटैनियम, पॉलिमर, और यहाँ तक कि बायोरिसॉर्बेबल सामग्री भी शामिल है।
ALIF ALIF का मतलब है एन्टीरियर लम्बर इंटरबॉडी फ़्यूज़न। यह प्रक्रिया भी PLIF के ही समान है, लेकिन इसे शरीर के अगले हिस्से (एन्टीरियर) से किया जाता है, इसमें सामान्यतः पेट के निचले हिस्से या बगल में 3-5 इंच का एक चीरा लगाया जाता है। इस शल्यक्रिया में पेट के निचले हिस्से की पेशियों को काटना, और बाद में उन्हें सीना भी शामिल हो सकता है।
हमारी संस्था में, एक मिनी ओपन ALIF तरीका भी उपलब्ध है, जिसमें पेशियाँ पूरी तरह सुरक्षित रहती हैं और एक बहुत ही छोटे चीरे से रीढ़ की हड्डी के अगले हिस्से तक पहुँचा जा सकता है। इस तरीके में पेट के निचले हिस्से की पेशियों की शक्ति और गतिविधियाँ बरकरार रहती हैं और इसका प्रयोग अक्सर L5-S1 चक्रिका स्थान के संयोजन के लिए किया जाता है।
एक बार चीरा लगाने और कोशिकाओं तक पहुँचने के बाद, और पेट की पेशियों तथा रक्तवाहिनियों को अलग खींचने के बाद, चक्रिका सामग्री निकाल दी जाती है। इसके बाद सर्जन हड्डी का ग्राफ़्ट (और ज़रूरी होने पर एन्टीरियर इंटरबॉडी पिंजरे, रॉड्स या पेंचों को भी) लगा देते हैं ताकि रीढ़ को स्थिरता मिले और संयोजन में आसानी रहे।
न्यूनतम एक्सेस हम अनेक प्रकार की रीढ़ की हड्डी (स्पाइन) की सर्जरी न्यूनतम चीरे वाली तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए निरंतर करते हैं। इन तकनीकों का विकास, मूलतः हर्नियेटेड लम्बर डिस्क के लिए माइक्रोडिस्केक्टॉमी सर्जरी के दौरान एंडोस्कोपी के प्रयोग के साथ शुरू हुआ। इसे अब संयोजन (फ़्यूज़न) सर्जरी में भी इस्तेमाल किया जाता है। हमारी क्लीनिकल टीम के किसी सदस्य से पूछें कि क्या यह आपके लिए सही रहेगा।
संयोजन (फ़्यूज़न) सर्जरी के बाद हर मरीज़ को सर्जरी के बाद ठीक होने में अलग-अलग समय लगता है। लेकिन, अधिकतर मरीज़ सर्जरी के बाद पहले ही दिन बिस्तर से उठकर चलने-फिरने लगते हैं। मरीज़ों को अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार, अस्पताल में 3-5 दिन तक रहने की उम्मीद करनी चाहिए। अस्पताल से छुट्टी होने के बाद PLIF, ALIF, या TLIF कराने वाले मरीज़ों को ज़रूरत पड़ने पर दर्द की दवाओं का नुस्ख़ा दिया जाता है और साथ ही ऑपरेशन के बाद की गतिविधियों की विस्तृत कार्य-योजना भी, ताकि उन्हें ठीक होने और स्वस्थ जीवन बिताने में मदद मिल सके।
डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस का इलाज TLIF से कराने वाले मामले का उदाहरण


इस 58 वर्षीय महिला को L4/5 स्तर पर डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस थी, जैसा कि ऊपर के एक्स-रे और MRI में दिखाया गया है। उन्हें दूर तक चलने में कठिनाई होती थी और पीठ तथा टाँगों में दर्द रहता था। उनका इलाज लैमिनेक्टॉमी और फ़्यूज़न पद्धति से उपकरण लगाकर किया गया।
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उपकरणों सहित रीढ़ की हड्डी का संयोजन कम से कम चीरे वाली स्पाइन (रीढ़ की हड्डी) सर्जरी स्पोंडिलोलिस्थीसिस सिंहावलोकन स्पोंडिलोलिस्थीसिस – डीजेनेरेटिव
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