रीढ़ की हड्डी की बनावट का सिंहावलोकन (स्पाइनल एनाटॉमी ओवरव्यू)

रीढ़ की हड्डी की बनावट और उसके कामकाज की बुनियादी जानकारी, जो रीढ़ की हड्डी से संबंधित बीमारियों के मरीज़ों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। इस लेख में रीढ़ की हड्डी की उल्लेखनीय तथा जटिल बनावट का सीधा विवरण मिलता है। पहले रीढ़ की हड्डी के कामकाज, उसके विभिन्न हिस्सों और प्रमुख घुमावों का "बड़ा चित्र" दिया गया है। इसके बाद बनावट संबंधी विशिष्ट तत्त्वों, जैसे कि कशेरुकाओं की बनावट, कशेरुकाओं के बीच की चक्रिकाओं, सुषुम्ना और तंत्रिका-मूलों, जोड़ों, पेशियों और स्नायु-बंधों (लिगामेंट्स) के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है।

रीढ़ की हड्डी के कार्य
रीढ़ की हड्डी के तीन प्रमुख कार्य हैं:

  • सुषुम्ना, तंत्रिका-मूलों और शरीर के कई आंतरिक अवयवों की सुरक्षा करना।
  • शरीर को सीधी मुद्रा में बनाए रहने के लिए ढाँचागत सहायता और संतुलन उपलब्ध कराना।
  • गतिशीलता में लचीलापन बनाए रखना

रीढ़ की हड्डी के क्षेत्र
आम तौर पर, रीढ़ की हड्डी को 4 मुख्य क्षेत्रों में विभाजित किया जाता हैः सर्वाइकल (गर्दन), थोरैसिक (छाती), लम्बर (पीठ का निचला हिस्सा) और सैक्रल (त्रिकास्थि)। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्टतायें और कार्य होते हैं।

सर्वाइकल स्पाइन
रीढ़ की हड्डी का गर्दन के आसपास का हिस्सा सर्वाइकल स्पाइन कहलाता है। इस क्षेत्र में सात कशेरुकायें होती हैं, जिन्हें (ऊपर से नीचे के क्रम में) C1 से C7 के नाम से जाना जाता है। ये कशेरुकायें मस्तिष्क को सुषुम्ना से जोड़ने वाले भाग और सुषुम्ना की रक्षा करती हैं, खोपड़ी को सहारा देती हैं, और सर को तरह-तरह से हिलाने में सहायक होती हैं।

पहली सर्वाइकल कशेरुका (C1) को एटलस कहा जाता है। एटलस का आकार अँगूठी की तरह होता है और यह खोपड़ी को सहारा देती है। C2 को एक्सिस कहते हैं। यह आकार में गोल होती है और इसमें एक भोथरा, खूँटी जैसा उभार होता है (जिसे ओडोन्टॉयड प्रक्रिया या ‘‘डेन्स’’ कहते हैं), जो ऊपर, एटलस के गोले के अंदर तक उठा रहता है। एटलस और एक्सिस मिलकर सर को इधर-उधर घूमाने की क्षमता देती हैं। सर्वाइकल की अन्य कशेरुकायें (C3 से C7) डिब्बों के आकार की होती हैं, जिसमें उँगलियों जैसे उभार होते हैं जो कशेरुकाओं की पीठ से निकले होते हैं।

थोरैसिक स्पाइन
अंतिम सर्वाइकल कशेरुका के नीचे थोरैसिक स्पाइन की 12 कशेरुकायें होती हैं। इन्हें ऊपर से नीचे के क्रम में T1 से T12 कहा जाता है। T1 सबसे छोटी और T12 सबसे बड़ी थोरैसिक कशेरुका है। थोरैसिक कशेरुकायें सर्वाइकल हड्डियों से बड़ी होती हैं और इनके उभार भी अधिक लंबे होते हैं।

इन लंबे स्पाइनस प्रोसेसों के अलावा ये पसलियों से जुड़ी होने के कारण भी अधिक मज़बूत होती हैं। इन संरचनाओं के कारण थोरैसिक स्पाइन, सर्वाइकल या लम्बर क्षेत्रों की स्पाइन के मुकाबले अधिक स्थिर होती है। इसके अलावा, पसलियों का पिंजरा और लिगामेंट प्रणाली थोरैसिक स्पाइन की हिलने-डुलने की क्षमता को सीमित कर देते हैं और अनेक महत्त्वपूर्ण अवयवों की सुरक्षा करते हैं।

लम्बर स्पाइन
लम्बर स्पाइन में 5 कशेरुकायें हैं जिन्हें L1 से L5 (सबसे बड़ी) कहा जाता है। प्रत्येक लम्बर कशेरुका का आकार-प्रकार ऐसे डिज़ाइन किया गया है कि वह शरीर का अधिकांश भार उठा सके। लम्बर कशेरुका का प्रत्येक संरचना तत्त्व, सर्वाइकल और थोरैसिक क्षेत्रों में स्थित उसके समतुल्य समान अंगों से अधिक बड़ा, मोटा और चौड़ा होता है।

लम्बर स्पाइन की गतिशीलता, थोरैसिक स्पाइन से अधिक किन्तु सर्वाइकल स्पाइन से कम होती है। लम्बर फेसेट जोड़ों में खींचने-फैलाने की काफ़ी गुंजाइश होती है लेकिन एक ही जगह पर घूमना सीमित रहता है।

सैक्रल स्पाइन
सैक्रम श्रोणि के पीछे स्थित होती है। पाँच हड्डियाँ (S1 से S5) त्रिकोणीय आकार में आपस में संयुक्त होकर त्रिकास्थि बनाती हैं। यह त्रिकास्थि या सैक्रम दोनों कूल्हे की हड्डियों के बीच होती है और रीढ़ को श्रोणि से जोड़ती है। अंतिम लम्बर कशेरुका (L5) सैक्रम के साथ घूमती है। सैक्रम के ठीक नीचे पाँच और हड्डियाँ होती हैं, जो आपस में संयुक्त होकर अनुत्रिक (tailbone) बनाती हैं।

श्रोणि ओर खोपड़ी
हालाँकि श्रोणि ओर खोपड़ी को सामान्यतः रीढ़ की हड्डी का हिस्सा नहीं माना जाता है, लेकिन ये दोनों शरीर के ऐसे अंग हैं, जिनका रीढ़ के साथ गहरा संबंध है और मरीज़ के संतुलन पर भी गहरा प्रभाव होता है।

रीढ़ की हड्डी के सतहें
रीढ़ की बनावट को ज़्यादा अच्छी तरह समझने और समझाने के लिए रीढ़ की हड्डी के विशेषज्ञ अक्सर शरीर की विशिष्ट सतहों का उल्लेख करते हैं। शरीर की सतह, एक काल्पनिक चपटी, दो-आयामी सतह है, जिसका इस्तेमाल शरीर के किसी हिस्से को समझने के लिए किया जाता है।

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शब्द अर्थ
फ्रंटल या कोरोनल प्लेन पूरे शरीर को आगे और पीछे के दो हिस्सों में विभाजित करती है।
मीडियन या सैजिटल प्लेन पूरे शरीर को दाहिने और बायें हिस्सों में विभाजित करती है।
ट्रांसवर्स या एक्सियल प्लेन शरीर को कमर के भाग से दो हिस्सों में विभाजित करती है (ऊपर और नीचे के हिस्से)।

रीढ़ की हड्डी के झुकाव
सामने की ओर से (कोरोनल प्लेन) देखने पर स्वस्थ रीढ़ सीधी होती है। (बगल की ओर झुकाव को स्कोलियोसिस कहा जाता है।) बगल की ओर से (सैजिटल प्लेन) देखने पर वयस्क रीढ़ में चार स्पष्ट झुकाव होते हैं। इन झुकावों को काइफ़ोटिक या लॉर्डोटिक कहा जाता है।

काइफ़ोटिक झुकाव रीढ़ की हड्डी में कॉनवेक्स झुकाव होता है (जिसमें बढ़ा हुआ हिस्सा रीढ़ के पीछे की ओर होता है)। थोरैसिक और सैक्रल स्पाइन के झुकाव काइफ़ोटिक होते हैं।

लॉर्डोटिक झुकाव कॉनकेव होता है, (जिसमें रीढ़ के पीछे की ओर अवतलता होती है), और यह झुकाव सर्वाइकल और लम्बर स्तरों में पाया जाता है।

कशेरुका की संरचना
सभी कशेरुकाओं की बुनियादी संरचना एक सी होती है, सिवाय पहली दो सर्वाइकल कशेरुकाओं के।

कशेरुका का बाहरी खोल कॉर्टिकल हड्डी से बना हुआ होता है। इस तरह की हड्डी घनी, ठोस और मज़बूत होती है। प्रत्येक कशेरुका के अंदर कैंसेलस हड्डी होती है, जो कॉर्टिकल हड्डी से कमज़ोर होती है और उसकी संरचना ढीली-ढाली और कुछ-कुछ मधुमक्खी के छत्ते जैसी होती है। कैंसेलस हड्डी की गुहाओं में अस्थि मज्जा पाई जाती है, जो रक्त की लाल कोशिकाओं और कुछ प्रकार की श्वेत कोशिकाओं का निर्माण करती है।

कशेरुकाओं में निम्न सामान्य तत्त्व पाये जाते हैं:

  • कशेरुका दण्ड (वर्टीब्रल बॉडी): कशेरुका का सबसे बड़ा भाग। ऊपर से देखने पर इसका आकार सामान्यतः अंडाकार होता है। बगल से देखने पर, वर्टिब्रल बॉडी रेत-घड़ी की तरह लगती है, जो किनारों पर मोटी और बीच में पतली होती है। यह बॉडी बाहर से मज़बूत कॉर्टिकल हड्डी से ढँकी होती है जबकि अंदर कैंसेलस हड्डी होती है।
  • वृन्त (पेडीकल्स): ये दो छोटे सींग जैसे हिस्से हैं, जो मज़बूत कॉर्टिकल हड्डी से बने होते हैं और वर्टिब्रल बॉडी के पीछे से निकले रहते हैं।
  • फलक (लैमीनी): हड्डी की दो अपेक्षाकृत चपटी प्लेटें जो पेडीकल्स के दोनों ओर से उभरी रहती हैं और बीच में जुड़ी होती हैं।
  • प्रॉसेसेज़ः तीन तरह की प्रॉसेस होती हैं: ऑर्टिकुलर, ट्रांसवर्स और स्पाइनस। प्रॉसेस लिगामेंट और टैंडन के जुड़ाव बिंदु का काम करती हैं।

एक कशेरुका की 4 ऑर्टिकुलर प्रॉसेस, अगली कशेरुका की ऑर्टिकुलर प्रॉसेस से मिलकर फेसेट जोड़ बनाती हैं। फेसेट जोड़ों और कशेरुकाओं के बीच की चक्रिकाओं की मदद से रीढ़ की हड्डी में गतिशीलता आती है।

स्पाइनस प्रॉसेस दो लैमीनी के जुड़ने के बिंदु से पीछे की ओर बढ़ी होती है और कशेरुका के मुड़ने के लिए लीवर का काम करती है।

  • एंडप्लेट्सः प्रत्येक वर्टिब्रल बॉडी के ऊपर (सुपीरियर) और नीचे (इन्फ़ीरियर) के भाग पर एंडप्लेट की “कोटिंग” होती है। एंडप्लेट्स जटिल संरचनायें हैं, जो कशेरुकाओं के बीच की चक्रिका के साथ "एकरूप" हो जाती है और उसे सहारा देती हैं।
  • अन्तराकशेरुक रन्ध्र (इंटरवर्टिब्रल फ़ोरामेन): पेडीकल्स की ऊपरी सतह पर एक छोटी खाँच और निचली सतह पर एक गहरी खाँच होती है। कशेरुकाओं के एक के ऊपर एक रखे होने की स्थिति में पेडीकल खाँचे एक क्षेत्र बनाते हैं जिन्हें इंटरवर्टिब्रल फ़ोरामेन कहते हैं। यह क्षेत्र अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि यहीं से होकर तंत्रिका मूल, सुषुम्ना से निकलकर सारे शरीर में जाते हैं।

फेसेट जोड़
रीढ़ की हड्डी के जोड़ वर्टिब्रल बॉडी के पीछे की ओर (पोस्टीरियर) होते हैं। ये जोड़ रीढ़ की हड्डी को झुकने, घूमने, और विभिन्न दिशाओं में फैलने में सहायता करते हैं। हालाँकि ये जोड़ गतिशीलता को संभव बनाते हैं लेकिन यही अत्यधिक गतिशीलता, जैसे कि ज़्यादा फैलने और ज़्यादा सिकुड़ने (ह्वीप्लैश) पर अंकुश भी लगाते हैं।

प्रत्येक कशेरुका में दो फेसेट जोड़ होते हैं। सुपीरियर आर्टिकुलर फेसेट का मुँह ऊपर की तरफ़ होता है और वह इन्फ़ीरियर आर्टिकुलर फेसेट के साथ (नीचे) कब्ज़े की तरह काम करता है।

शरीर के अन्य जोड़ों की तरह, प्रत्येक फेसेट जोड़ भी आपस में जुड़े हुए ऊतकों की कैप्सूल से घिरा होता है और जोड़ को पुष्ट तथा चिकना रखने के लिए श्लेषक (साइनोवियल) फ़्लुइड पैदा करता है। जोड़ की सतहों पर कार्टिलेज लगे होते हैं, जिनसे उन्हें आसानी से घूमने (आर्टिकुलेट) में मदद मिलती है।

अन्तराकशेरुक चक्रिकायें (इंटरवर्टिब्रल डिस्क्स)
प्रत्येक वर्टिब्रल बॉडी के बीच एक “कुशन” होता है जिसे इंटरवर्टिब्रल डिस्क कहते हैं। प्रत्येक डिस्क या चक्रिका, गतिशीलता के दौरान शरीर पर पड़ने वाले दबाव और झटके बर्दाश्त करती है और कशेरुकाओं को एक-दूसरे की रगड़ से बचाती है। कशेरुकाओं के बीच की ये चक्रिकायें शरीर की उन संरचनाओं में सबसे बड़ी संरचना हैं, जिन्हें रक्तसंचार की ज़रूरत नहीं होती। प्रत्येक चक्रिका, ऑस्मॉसिस के ज़रिये आवश्यक पोषण प्राप्त करती है।

प्रत्येक चक्रिका दो हिस्सों में बनी होती हैः एनलस फ़ाइब्रोसस और न्यूक्लियस पल्पोसस

एनलस फ़ाइब्रोसस
एनलस एक मज़बूत टायर जैसी संरचना है, जिसके बीच में जैल जैसा केन्द्र, न्यूक्लियस पल्पोसस रहता है। एनलस, रीढ़ की घूमने की क्षमता बढ़ाता है और दबाव सहने में मदद देता है।

एनलस में पानी और मज़बूत लचीले कोलेजन फ़ाइबर की परतें होती हैं। ये फ़ाइबर, चौड़ाई की दिशा में, अलग-अलग कोणों पर उभरे होते हैं, जो रेडियल टायर की संरचना के समान होता है। कोलेजन आपस में जुड़े प्रोटीन के मजबूत फ़ाइब्रस बंडलों से शक्ति प्राप्त करते हैं।

न्यूक्लियस पल्पोसस
प्रत्येक इंटर वर्टिब्रल चक्रिका का मध्य भाग एक जैल-जैसे लचीले पदार्थ से भरा होता है। एनलस फ़ाइब्रोसस के साथ मिलकर न्यूक्लियस पल्पोसस दबाव और भार को एक कशेरुका से दूसरी को भेजता रहता है। एनलस फ़ाइब्रोसस की तरह न्यूक्लियस पल्पोसस में भी पानी, कोलेजन और प्रोटियोग्लाइकैन्स होते हैं। लेकिन, न्यूक्लियस पल्पोसस में इन पदार्थों का अनुपात भिन्न होता है। न्यूक्लियस में पानी की मात्रा एनलस से अधिक होती है।

सुषुम्ना और तंत्रिका मूल
सुषुम्ना एक पतली, सिलिंडर की आकृति वाली संरचना है, जिसकी चौड़ाई लगभग छोटी उँगली के बराबर होती है। सुषुम्ना ठीक ब्रेन स्टेम के नीचे से शुरू होती है और पहली लम्बर कशेरुका (L1) तक लंबी होती है। इसके बाद, सुषुम्ना कोनस मेड्युलैरिस में मिल जाती है, जो आगे जाकर कॉडा एक्विना बन जाती है। यह तंत्रिकाओं का एक समूह है जो घोड़े की पूँछ की तरह दिखता है। सुषुम्ना से निकलने वाले तंत्रिका मूल गतिशीलता बढ़ाने और भावनाओं को उत्तेजित करने का काम करते हैं। तंत्रिका मूल, कशेरुकाओं के बीच के छिद्रिल स्थानों इंटरवर्टिब्रल फ़ोरामैन के ज़रिये रीढ़ की नालिका से बाहर निकलते हैं।

मस्तिष्क और सुषुम्ना को मिलाकर केन्द्रीय तंत्रिका प्रणाली (CNS) बनती है। सुषुम्ना/स्पाइनल कैनाल से निकलने वाली तंत्रिकायें पूरे शरीर में फैलकर परिसरीय तंत्रिका प्रणाली (PNS) बनाती है।

कशेरुकाओं के अगले और पिछले भागों के बीच (यानी मध्य भाग में) रीढ़ की नालिका स्थित है जिसमें सुषुम्ना और इंटरवर्टिब्रल फ़ोरामैन रहते हैं। फ़ोरामैन, प्रत्येक कशेरुका के बीच बनने वाले छोटे छिद्र हैं। इन्हीं “छेदों” से तंत्रिकायें रीढ़ की नालिका से बाहर निकलती है और शाखाओं में फैलकर परिसरीय तंत्रिका प्रणाली बनाती हैं।

तंत्रिकाओं से संबंधित संरचना के प्रकार भूमिका/कार्य
ब्रेन स्टेम यह सुषुम्ना को मस्तिष्क के अन्य भागों से जोड़ता है।
सुषुम्ना मस्तिष्क और सुषुम्ना से संबंधित तंत्रिकाओं के बीच संवेदनायें ले जाने का काम करती है।
सर्वाइकल तंत्रिकायें (8 जोड़े) ये तंत्रिकायें सिर, गर्दन, कंधों, बाँहों, और हाथों तक संवेदना पहुँचाती हैं।
थोरैसिक तंत्रिकायें (12 जोड़े) पेट के ऊपरी हिस्से और पीठ तथा छाती की पेशियों को जोड़ती है।
लम्बर तंत्रिकायें (5 जोड़े) पीठ के निचले हिस्से और टाँगों तक संवेदनाएँ पहुँचाती हैं।
सैक्रल तंत्रिकायें (5 जोड़े) नितम्बों, टाँगों, पैरों, गुदा और जननांगों तक संवेदना पहुँचाती हैं।
डर्माटोम्स त्वचा की सतह के हिस्सों को सुषुम्ना के एक तंत्रिका मूल से नर्व फ़ाइबर्स द्वारा आपूर्ति की जाती है।

लिगामेंट, पेशियाँ और टैंडन
स्नायु (लिगामेंट)
लिगामेंट और टैंडन (कण्डरा) आपस में जुड़े ऊतकों के फ़ाइब्रस बैंड हैं जो हड्डियों से जुड़े रहते हैं। लिगामेंट्स दो या दो से अधिक हड्डियों को आपस में जोड़ते हैं और जोड़ों को स्थिर रखने में मदद देते हैं। टैंडन्स पेशी को हड्डी से जोड़ते हैं। वे भिन्न-भिन्न आकार के होते हैं और कुछ लचीले होते हैं।

कशेरुकाओं की पंक्ति में लिगामेंट्स प्रणाली, टैंडन्स और पेशियों के साथ मिलकर, रीढ़ को चोट से बचाने के लिए स्वाभाविक ब्रेस का काम करती है। लिगामेंट्स आराम और कामकाज के दौरान जोड़ को स्थिर रखते हैं। यही नहीं, लिगामेंट्स अत्यधिक खिंचाव या सिकुड़न से नुकसान को रोकते हैं।

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स्नायु (लिगामेंट) नाम विवरण
एंटीरियर लॉन्गिट्यूडिनल लिगामेंट (ALL)
रीढ़ को स्थिरता प्रदान करने वाला प्रमुख लिगामेंट
ALL लगभग एक इंच चौड़ा है और रीढ़ की पूरी लंबाई में, खोपड़ी के ठीक नीचे से सैक्रम तक फैला होता है। यह वर्टिब्रल बॉडी के अगले हिस्से (एन्टीरियर) को एनलस फ़ाइब्रोसस के अगले हिस्से से जोड़ता है।
पोस्टीरियर लॉन्गिट्यूडिनल लिगामेंट (PLL)
रीढ़ को स्थिरता प्रदान करने वाला प्रमुख लिगामेंट
लगभग एक इंच चौड़ा PLL खोपड़ी के ठीक नीचे से सैक्रम तक, रीढ़ की पूरी लंबाई में फैला है। यह वर्टिब्रल बॉडी के पिछले हिस्से (पोस्टीरियर) को एनलस फ़ाइब्रोसस के पिछले हिस्से से जोड़ता है।
सुप्रास्पाइनस लिगामेंट यह लिगामेंट प्रत्येक स्पाइनस प्रोसेस के सिरे को दूसरे से जोड़ता है।
इंटरस्पाइनस लिगामेंट यह पतला लिगामेंट, सुषुम्ना में काफी गहराई तक स्थित एक अन्य लिगामेंट, लिगामेंटम फ़्लेवम से जुड़ा होता है।
लिगामेंटम फ़्लेवम
सबसे मज़बूत लिगामेंट
यह पीला लिगामेंट सबसे मज़बूत होता है। यह लैमिना के आगे और पीछे से होते हुए खोपड़ी के ठीक नीचे से श्रोणि तक जाता है एवं सुषुम्ना और तंत्रिकाओं की रक्षा करता है। लिगामेंटम फ़्लेवम फेसेट जोड़ के कैप्सूल को भी आवृत्त करता है।

पेशियाँ और कण्डरायें (टैंडन्स)
रीढ़ की हड्डी की पेशी प्रणाली काफ़ी जटिल है और उसमें अनेक भिन्न-भिन्न पेशियाँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पेशियों का प्रमुख कार्य है रीढ़ की हड्डी को सहारा और मज़बूती प्रदान करना। शरीर के अलग-अलग हिस्सों की गतिशीलता से अलग-अलग पेशियाँ जुड़ी हुई हैं। जैसे कि, स्टर्नोक्लेडोमैस्टॉयड पेशी सर हिलाने में सहायता करती है, जब कि कटि विद्राधि (Psoas Major) पेशी जाँघ की गतिशीलता से संबंधित होती है।

पेशियाँ, अलग-अलग या समूह में फ़ेशिया से सहारा पाती हैं। फ़ेशिया जोड़ने वाले मज़बूत ऊतक होते हैं। पेशियों को हड्डी से जोड़ने वाले टैंडन फ़ेशिया का हिस्सा होते हैं। कशेरुकाओं की पंक्ति की पेशियों को फ़्लेक्सर, रोटेटर, या एक्सटेंसर कहते हैं।


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