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रीढ़ की हड्डी की रसौली (स्पाइनल ट्यूमर्स)
किसी भी मरीज़ को जब यह पता लगता है कि उसे स्पाइनल ट्यूमर है, तो उसके लिए यह बड़ा पीड़ादायक अनुभव होता है। लेकिन, स्पाइनल ट्यूमर्स भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं और उनके इलाज के भी भिन्न-भिन्न विकल्प हैं और कई ट्यूमर्स के ठीक होने की संभावना आज, कुछ वर्ष पूर्व के मुकाबले कहीं अधिक है।
इस लेख में स्पाइनल ट्यूमर के प्रकारों और उनके विभिन्न उपचार विकल्पों की जानकारी दी गई है। लेख का प्रारंभ प्रायः होनेवाले ट्यूमरों और उनके इलाज के बारे में दी गई आम जानकारी से हुआ है और उसके बाद ट्यूमरों के विशिष्ट प्रकारों के बारे में बताया गया है।
स्पाइनल ट्यूमर्स का वर्गीकरण स्पाइनल ट्यूमर्स नियोप्लाज़्म नामके नये ऊतकों की अस्वाभाविक वृद्धि हैं। ये रीढ़ की हड्डी में अपेक्षाकृत बहुत ही कम पाये जाते हैं। सामान्यतः नियोप्लाज़्म दो तरह के होते हैं, बिनाइन (जो कैंसरग्रस्त नहीं होते) या मैलिग्नेंट (जो कैंसरग्रस्त होते हैं)। बिनाइन ट्यूमर्स भले ही हड्डी के सामान्य ऊतकों को नष्ट करने वाले हों, लेकिन वे दूसरे ऊतकों को प्रभावित नहीं करते। लेकिन, मैलिग्नेंट ट्यूमर्स रीढ़ की कशेरुकाओं के अवयवों पर तो हमला करते हीं हैं, उसके साथ ही उनके अन्य अवयवों तक फैलने की भी आशंका रहती है।
ट्यूमर्स के वर्गीकरण में सहायक अन्य बुनियादी शब्द हैं:
- प्राइमरीः प्राइमरी स्पाइनल ट्यूमर रीढ़ की हड्डी के ढाँचे के अंदर शुरू होता है।
- सेकंडरीः सेकंडरी स्पाइनल ट्यूमर रीढ़ की हड्डी के अलावा शरीर के किसी अन्य भाग में शुरू होता है और फिर रीढ़ की हड्डी में फैल जाता है। किसी अन्य अंग से रीढ़ की हड्डी में फैलने की प्रक्रिया को मेटास्टेसाइज़िंग कहते हैं।
सभी सेकंडरी स्पाइनल ट्यूमर्स चूँकि शरीर के किसी और हिस्से से शुरू होते हैं इसलिए पारिभाषिक तौर पर सभी मैलिग्नेंट हैं क्योंकि उनमें शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक फैलने की क्षमता होती है।
लक्षण स्पाइनल ट्यूमर के लक्षण कई तत्त्वों पर निर्भर होते हैं, जैसे ट्यूमर का स्थान, वह कितनी जल्दी बढ़ रहा है, रीढ़ के अन्य तत्त्वों तक फैलना, सुषुम्ना और तंत्रिकाओं पर उसका असर, और रीढ़ की स्थिरता पर प्रभाव।
स्पाइनल ट्यूमर संबंधी प्रारंभिक लक्षणों में पीठ और टाँगों का दर्द हो सकता है। कुछ स्पाइनल ट्यूमर्स से टाँगों या बाँहों में कमज़ोरी और सुन्न पड़ना, शियाटिका, आंशिक पक्षाघात, हाथों से चीज़ें गिरना, स्तब्धता, मल-मूत्र संबंधी समस्यायें, या रीढ़ की हड्डी की विकृति हो सकती है। इसके लक्षण धीरे-धीरे विकसित हो सकते हैं या अचानक दिखाई दे सकते हैं और इलाज न कराने पर लक्षण आम तौर पर बिगड़ते जाते हैं।
निदान निदानात्मक प्रक्रिया में मरीज़ का विस्तृत चिकित्सीय इतिहास जानने और शारीरिक तथा तंत्रिका-तंत्र से संबंधित परीक्षण करने की ज़रूरत होती है। इसके अलावा, प्रयोगशाला की जाँच और इमेजिंग तकनीक जैसे अध्ययन से मरीज़ के स्वास्थ्य के ऐसे पहलुओं का पता चल सकता है जो परीक्षणों के दौरान सामने नहीं आये थे।
प्रयोगशाला जाँच
- अंतर के साथ कम्पलीट ब्लड काउंट (CBC): रक्त के नमूने में लाल कोशिकाओं, सफेद कोशिकाओं और प्लेटलेट्स की संख्या की जाँच की जाती है। हेमोग्लोबिन (ऑक्सीजन वाहक प्रोटीन) और हेमाटोक्रिट (लाल कोशिकाओं का प्रतिशत) का भी आकलन किया जाता है।
- कॉम्प्रिहेंसिव मेटाबॉलिक पैनलः मरीज़ के गुर्दे और जिगर के कामकाज, इलेक्ट्रोलाइट और एसिड/बेस संतुलन तथा रक्त में चीनी के स्तर के बारे में जानकारी देता है।
- एरिथोसाइट सेडिमेंटेशन रेट (SED Rate): यह तकनीक सूजन का स्तर नापने के लिए प्रयोग में लाई जाती है।
- सीरम प्रोटीन इलेक्ट्रोफ़ोरेसिस (SPE): रक्त में नमूने में प्रोटीन के विभिन्न भागों की गिनती करता है।
- एसिड फ़ॉस्फ़ेटेज़ः पता लगाता है कि क्या प्रोस्टेट कैंसर शरीर के अन्य भागों तक फैल गया (मेटास्टेसाइज्ड) है।
- बेन्स जोन्स प्रोटीन के साथ यूरिनैलिसिसः बेन्स जोन्स प्रोटीन, मूत्र में पाये जाने वाले छोटे प्रोटीन हैं। इन प्रोटीन्स के लिए की जाने वाली जाँच से मल्टिपल मायलोमा या प्लाज़्मासाइटोमा का पता लगाने में मदद मिलती है।
इमेजिंग अध्ययन
- एक्स-रे (सादे रेडियोग्राफ़): रीढ़ की हड्डी की बनावट के, विभिन्न कोणों जैसे कि एंटीरो-पोस्टीरियर (AP), लेटरल, और ऑब्लीक कोणों से चित्र उपलब्ध कराता है। एक्स-रे से कई बीमारियों, जैसे कि फ्रैक्चर और ट्यूमर हड्डी को कैसे प्रभावित कर रहा है, इस बारे में पता चलता है।
- टेक्नीशियम (T99) बोन स्कैनः टेक्नीशियम, विकिरण का स्त्रोत है जिसका प्रयोग बोन स्कैन्स में फ्रैक्चर, संक्रमण, या कैंसर का पता लगाने के लिए किया जाता है।
- मैग्नेटिक रेसोनेंस इमेजिंग (MRI): MRI बेहद संवेदनशील इमेजिंग पद्धति है जो हड्डियों और कोमल ऊतकों के तीन-आयामी, विस्तृत चित्र प्रस्तुत करती है।
- मायलोग्राम सहित CT स्कैनः मायलोग्राफ़ी में, रेडियोग्राफ़्ट कंट्रास्ट माध्यम (डाई) को कशेरुका दण्ड के नाल (स्पाइनल कैनाल) के द्रव में इंजेक्ट किया जाता है ताकि स्पाइनल कैनाल, सुषुम्ना, और तंत्रिका-मूलों को प्रकाशित किया जा सके। CT स्कैन और इन चित्रों से पता चलता है कि रीढ़ की हड्डियाँ तंत्रिकाओं पर कहाँ-कहाँ दबाव डाल रही हैं।
स्पाइनल ट्यूमर बायोप्सी इमेजिंग जाँच पूरी हो जाने के बाद, ट्यूमर के प्रकार का पता लगाने का सबसे अच्छा तरीका बायोप्सी है। बायोप्सी ट्यूमर के ऊतक और कोशिकाओं की माइक्रोस्कोप से की जाने वाली जाँच है। कैंसर का निश्चित निदान करने का एकमात्र तरीका, अक्सर बायोप्सी ही होती है।
ट्यूमर का नमूना प्राप्त करने का तरीका कई तत्त्वों पर निर्भर होता है, जिनमें ट्यूमर का स्थान और मरीज़ का स्वास्थ्य भी शामिल हैं। बायोप्सी दो तरह से की जा सकती है। नीडल बायोप्सी त्वचा के ज़रिये की जाती है और इसमें फ़्लूरोस्कोपी जैसे इमेज गाइडेंस का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा खुली सर्जिकल प्रक्रिया द्वारा भी ट्यूमर के नमूने प्राप्त किये जा सकते हैं।
उपचार के विकल्प स्पाइनल ट्यूमर के इलाज में अक्सर कई विशेषज्ञों की ज़रूरत पड़ती है, जिनमें स्पाइन सर्जन, न्यूरो-रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, ऑन्कोलॉजिस्ट, और दर्द नियंत्रण विशेषज्ञ शामिल होते हैं।
इलाज का प्रकार, आम तौर पर, मरीज़ के लक्षणों और स्वास्थ्य, इमेजिंग अध्ययन और बायोप्सी के नतीजों पर निर्भर होता है। कई मरीज़ों के लिए ग़ैर-सर्जिकल और सर्जिकल इलाजों के समन्वय की ज़रूरत होती है। प्रत्येक मामले का व्यक्तिगत तौर पर आकलन किया जाता है और मरीज़ की आवश्यकता के अनुसार इलाज तय किया जाता है।
ग़ैर-सर्जिकल उपचार ग़ैर सर्जिकल इलाज किस प्रकार का हो, यह भी कई बातों पर निर्भर होता है, जिनमें शामिल है- ट्यूमर का प्रकार (बिनाइन या मैलिग्नेंट), उसका स्तर, इलाज का उद्देश्य (दर्द में कमी, रोगमुक्ति), मरीज़ की संभावित उम्र और सामान्य स्वास्थ्य।
- ब्रेसिंग (Corset): ब्रेस या कॉर्सेट से रीढ़ की हड्डी को सहारा मिलता है और दर्द कम होता है। मरीज़ की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप ख़ास ब्रेस तैयार करने में ऑर्थोटिस्ट की सहायता ली जा सकती है।
- कीमोथेरेपीः कीमोथेरेपी में, कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि और प्रजनन क्षमता में बाधा डालकर उन्हें नष्ट करने वाली दवाओं के प्रयोग से कैंसर का इलाज और उस पर नियंत्रण किया जाता है। कीमोथेरेपी की ऐसी कई प्रकार की दवायें हैं, जिन्हें अन्य उपचारों के साथ भी समन्वित किया जा सकता है।
- दर्द की थेरेपीः इसे रोगोपशामक (palliative) उपचार भी कहते हैं। इसका लक्ष्य है, दर्द से राहत दिलाना, लक्षणों में कमी करना, और जटिलताओं को रोकना। ये इलाज, बीमारी को ख़त्म नहीं करते, बल्कि मरीज़ के जीवन की गुणवत्ता में सुधार ज़रूर लाते हैं। इस इलाज में सूजन रोकने वाली दवायें, मुँह से या IV इंजेक्शन से ली जाने वाली नशीली दवायें, और मॉर्फीन पेन पंप शामिल हैं।
- विकिरण (रेडियेशन) थेरेपीः रेडियेशन थेरेपी, कैंसर कोशिकाओं को मारकर और नष्ट करके, ट्यूमर को छोटा करके या उसका बढ़ना रोककर, बीमारी पर काबू पाने में सहायक हो सकती है। रेडियेशन मैलिग्नेंट कोशिका के DNA को निशाना बनाता है, क्योंकि उस पर विकिरण का प्रभाव एक सामान्य कोशिका से अधिक होता है। कोशिका के DNA को बदल देने से उसकी विभाजित होने और बढ़ने की क्षमता में बाधा पड़ती है। रेडियेशन थेरेपी बाह्य अथवा आंतरिक उपचार के तौर पर, या दोनों रूपों में उपलब्ध है। आंतरिक रेडियेशन थेरेपी को अन्तरालीय (interstitial) रेडियेशन भी कहते हैं और इसमें शरीर में एक रेडियोधर्मी पदार्थ पहुँचाया जाता है। यह रेडियोधर्मी पदार्थ कैप्सूल या ट्यूब जैसे एक छोटे कंटेनर में बंद रहता है।
सर्जिकल उपचार स्पाइनल ट्यूमर बिनाइन हो या मैलिग्नेंट, सर्जरी का लक्ष्य दर्द कम करना और तंत्रिकाओं का कामकाज लायक बनाना या उनकी क्रियाशीलता बरकरार रखना और रीढ़ की स्थिरता है। सर्जरी से आंशिक रूप से (resection) या पूरी तरह (excision) हटा दिये जाने के बाद भी कुछ ट्यूमर्स को रेडियेशन या कीमोथेरेपी जैसे ग़ैर-सर्जिकल इलाज की ज़रूरत पड़ती है।
स्पाइनल ट्यूमर के इलाज में सर्जरी की ज़रूरत तब पड़ती है, जब उसके नमूने की ज़रूरत हो (open biopsy), ट्यूमर के कारण सुषुम्ना या तंत्रिकायें दब रही हों, तंत्रिकाओं का ह्रास बढ़ रहा हो, दर्द पर ग़ैर-सर्जिकल उपचार का असर न हो रहा हो, कशेरुकायें नष्ट हो रही हों और रीढ़ की हड्डी में अस्थिरता पैदा हो गई हो।
सर्जरी का स्थानः
- ट्यूमर का स्थानः सभी स्पाइनल ट्यूमर का ऑपरेशन संभव नहीं होता; कुछ ट्यूमर, रीढ़ के ऐसे हिस्से में स्थित हो सकते हैं, जहाँ पहुँचना कठिन हो।
- कीमोथेरेपी या रेडियेशनः इन उपचारों से मरीज़ की श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या प्रभावित हो सकती है। श्वेत कोशिकाओं की संख्या कम होने से, शरीर की संक्रमण से लड़ने और सर्जिकल घाव को भरने की क्षमता भी प्रभावित होती है।
- सामान्य स्वास्थ्यः कुछ उपचारों से मरीज़ की भूख मर जाती है जिसके कारण वज़न कम हो जाता है और सामान्य स्वास्थ्य भी गिर जाता है। घाव को भरने के लिए सही पोषण आवश्यक है।
स्पाइनल इंस्ट्रुमेंटेशन और फ़्यूज़न रीढ़ की हड्डी की स्थिरता और पुनर्निर्माण के लिए इन तरीकों का एक साथ प्रयोग किया जाता है। इंस्ट्रुमेंटेशन में चिकित्सा की दृष्टि से उपयुक्त उपकरणों, जैसे कि पिंजरों, रॉडों, और पेंचों का इस्तेमाल, फ़्यूज़न के दौरान रीढ़ को स्थिर रखने के लिए किया जाता है। इंस्ट्रुमेंटेशन के साथ फ़्यूज़न को बढ़ावा देने के लिए बोन ग्राफ़्ट, बोन सीमेंट, या BMPs का प्रयोग किया जाता है। जैसे-जैसे ग्राफ़्ट की सामग्री जुड़ने लगती है और इंस्ट्रुमेंटेशन के आसपास बढ़ती है, स्पाइनल फ़्यूज़न भी होता जाता है और एक ठोस संरचना बनाता है। सर्जरी के बाद, फ़्यूज़न होते समय मरीज़ को एक विशेष ब्रेस पहनने की ज़रूरत हो सकती है।
ठीक (स्वस्थ) होना मरीज़ को अस्पताल में कितने दिन रहना होगा, यह ऑपरेशन के प्रकार और अनुषंगी प्रभावों पर निर्भर होता है। उदाहरण के लिए, रेडियेशन थेरेपी या कीमोथेरेपी के काफ़ी अनुषंगी प्रभाव हो सकते हैं जिनमें जी मिचलाना, भूख न लगना, और थकना जैसे लक्षण शामिल है। सौभाग्य से, इन अनुषंगी प्रभावों का इलाज हो सकता है।
सर्जरी के बाद, इलाज करने वाले डॉक्टर मरीज़ की स्थिति और उसके ठीक होने पर कड़ी नज़र रखते हैं। समय-समय पर पुनर्मूल्याकंन के लिए नये सिरे से प्रयोगशाला परीक्षण और इमेजिंग करानी पड़ सकती है। दर्द का नियंत्रण दीर्घावधि इलाज का हिस्सा हो सकता है। मरीज़ में लचीलापन और शक्ति वापस लाने के लिए फ़िज़िकल थेरेपी की सलाह दी जा सकती है। इसके अलावा, इलाज करने वाले डॉक्टर मरीज़ के ठीक होने के कार्यक्रम में पौष्टिक भोज्य पदार्थों को भी शामिल कर सकते हैं।
ट्यूमर्स के प्रकार इस खंड में स्पाइनल ट्यूमर्स के कुछ सबसे आम प्रकारों का संक्षिप्त परिचय, और उनके आम उपचार दिये गये हैं।
प्राइमरी बिनाइन ट्यूमर
एन्यूरिस्मल बोन सिस्ट (ABC): ABC ‘‘वास्तविक’’ ट्यूमर नहीं है। लेकिन, इस अस्वाभाविक वृद्धि की बहुत सी बातें ट्यूमर के समान होती हैं और इसका इलाज भी उसी तरह किया जाता है। ABC खून से भरी हुई हड्डी की एक एकाकी ग्रोथ है, जो फ़ाइब्रस ऊतक की पतली दीवार से घिरी होती है। यह सिस्ट आम तौर पर 10-30 वर्ष के लोगों में जन्म लेती है। इससे सामान्यतः वर्टिब्रल बॉडीज़ तथा पिछली ओर के तत्त्व प्रभावित होते हैं। इसके लक्षणों में सूजन, दर्द (ख़ास तौर पर रात में) और दबाने पर दर्द शामिल हो सकते हैं। इसके सबसे आम इलाज हैं, अन्तःशल्य बनने की क्रिया (जैसे कि सिस्ट में रक्त का प्रवाह रोकना) और रीसेक्शन (जैसे कि उसे सर्जरी से निकाल देना)।
जायंट सैल रसौली (GCT): जायंट सैल ट्यूमर आम तौर पर न पाया जाने वाला और आक्रामक प्रकार का ट्यूमर है। यह प्राइमरी ट्यूमर आम तौर पर बिनाइन होता है और प्रायः 20-40 वर्ष की आयु के मरीज़ों में पाया जाता है (जिनकी हड्डियाँ वयस्क हो चुकी हों)। यह ट्यूमर पुरुषों से अधिक स्त्रियों को प्रभावित करता है। रीढ़ की हड्डी में, GCT के सैक्रम में होने की अधिक आशंका होती है और यह बढ़कर लम्बर स्पाइन तक पहुँच सकता है। कशेरुकाओं का GCT स्पाइनल कैनाल पर हमला कर सकता है और सुषुम्ना पर दबाव डाल सकता है। ट्यूमर के स्थान और फैलाव की स्थिति के आधार पर सूजन, हड्डियों का फ्रैक्चर, जोड़ों में दर्द, मल-मूत्र संबंधी समस्यायें और अन्य तंत्रिका संबंधी दोष (जैसे कि कमज़ोरी, सुन्न होना) जैसे लक्षण प्रकट हो सकते हैं।
इसके संभावित इलाज हैं, अन्तःशल्य बनने की क्रिया (जैसे कि सिस्ट में रक्त का प्रवाह रोकना) और रीसेक्शन (जैसे कि उसे सर्जरी से निकाल देना)। रेडियेशन थेरेपी की भी सलाह दी जा सकती है।
रक्तवाहिकाबुर्द (हेमेंजियोमा): स्पाइनल हेमेंजियोमा एक प्राइमरी, बिनाइन ट्यूमर है जो थोरैसिक तथा लम्बर स्पाइन में सबसे अधिक पाया जाता है। . इस प्रकार का ट्यूमर प्रायः वर्टिब्रल बॉडी को प्रभावित करता है लेकिन पेशियों पर भी असर डाल सकता है। इस ट्यूमर के बहुत कम लक्षण होते हैं, और यह अक्सर किसी अन्य बीमारी के लिए की जा रही जाँच से जाना जाता है। यह 30-50 वर्ष के रोगियों में सबसे ज़्यादा पाया जाता है।
हेमेंजियोमा के मरीज़ों पर दबाव के कारण होने वाले फ्रैक्चर, तंत्रिका-तंत्र के काम न करने या हेमेंजियोमा के कारण कोमल ऊतक समूह विकसित होने के लक्षणों की जाँच के लिए ख़ास नज़र रखी जाती है।
इलाज हेमेंजियोमा के आकार और स्थान पर निर्भर होता है। इसके इलाज में प्रायः रक्त प्रवाह रोकना (embolization), सर्जरी से ट्यूमर को निकालना (excision) और रेडियेशन थेरेपी का समन्वय होता है।
वेदनायुक्त सुक्ष्म अबुर्द (ऑस्टियोब्लास्टोमा) : ऑस्टियोब्लास्टोमा बिनाइन प्राइमरी ट्यूमर है, जिसमें हड्डियाँ ठीक से नहीं बनी होतीं और यह फ़ाइब्रस ऊतक होते हैं। इस प्रकार का ट्यूमर प्रायः 30 वर्ष से कम आयु के मरीज़ों में पाया जाता है और स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों को अधिक प्रभावित करता है। ऑस्टियोब्लास्टोमा के मामलों में से 40 प्रतिशत रीढ़ की हड्डी में होते हैं। इसमें आम तौर से पीछे के हिस्से प्रभावित होते हैं, हालाँकि वर्टिब्रल बॉडी और सैक्रम को प्रभावित करने के मामले भी मिलते हैं।
इसके लक्षण, ट्यूमर के स्थान पर निर्भर होते हैं और उनमें सूजन, दबाने पर दर्द, दर्द, और तंत्रिका-तंत्र का ह्रास (जैसे कमज़ोरी, सुन्न होना) भी शामिल हो सकते हैं।
इसके इलाज के लिए, सर्जरी द्वारा ट्यूमर को पूरी तरह निकाल देना ठीक रहता है।
ऑस्टिऑएड ऑस्टियोमाः ऑस्टिऑएड ऑस्टियोमा एक बिनाइन ट्यूमर है, जो सभी आयु वर्ग के लोगों में पाया जाता है। इस ट्यूमर का कारण ज्ञात नहीं है। इसमें ट्यूमर अपेक्षाकृत छोटे होते हैं। यह 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों और 40 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों में बहुत कम पाया जाता है। ऑस्टिऑएड ऑस्टियोमा के अधिकतर मरीज़ 5-25 वर्ष के होते हैं और यह स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में अधिक पाया जाता है। हालाँकि यह ट्यूमर हड्डियों के ढाँचे के सभी हिस्सों में होता है लेकिन 10-14 प्रतिशत मामलों में रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करता है।
स्पाइनल कॉलम में ऑस्टिऑएड ऑस्टियोमा होने से कड़ापन, स्कोलियोसिस, और रात में अधिक बढ़ने वाला दर्द हो सकता है। सबसे पहले मरीज़ के उठने-बैठने का ढंग प्रभावित होता है। समय के साथ ढाँचागत परिवर्तन भी हो सकते हैं जिनकी वजह से रीढ़ की हड्डी में बाँयीं या दायीं ओर असामान्य झुकाव पैदा हो जाता है।
इसका इलाज प्रायः सर्जरी द्वारा ट्यूमर को निकालकर किया जाता है।
प्राइमरी मैलिग्नेंट ट्यूमर्स
- उपास्थि का एक दुर्दम अबुर्द (कोंड्रोसारकोमा): कोंड्रोसारकोमा एक बहुत कम पाया जाने वाला और धीरे-धीरे बढ़ने वाला मैलिग्नेंट ट्यूमर है। वैसे तो यह रीढ़ के सभी स्तरों में पाया जाता है लेकिन इसका थोरैसिक स्पाइन में पाया जाना ज़्यादा आम है। यह ट्यूमर कशेरुकाओं को नष्ट कर सकता है। यह औसतन 45 वर्ष की आयु के आसपास होता है और यह स्त्रियों से अधिक पुरुषों में पाया जाता है। कोंड्रोसारकोमा फैल भी सकता है।
इसके लक्षणों में शामिल हैं, दर्द, छूने से पता चलने वाला आकार, और तंत्रिका-संबंधी शिकायतें (जैसे कमज़ोरी, सुन्न होना)।
ट्यूमर निकालने के लिए प्रायः सर्जरी आवश्यक होती है, और रोग दोबारा होने की भी आशंका रहती है। रेडियेशन और कीमोथेरेपी के मिले-जुले परिणाम होते हैं।
- कोर्डोमाः कोर्डोमा एक कम पाया जाने वाला, धीरे बढ़ने वाला अबुर्द (नियोप्लाज़्म) है जो बढ़ सकता है। वयस्कों में, सबसे अधिक पाया जाने वाला प्राइमरी मैलिग्नेंट स्पाइनल ट्यूमर कोर्डोमा है। यह ट्यूमर 30-70 वर्ष की आयु के मरीज़ों में पाया जाता है। कोर्डोमा प्रायः पीठ के निचले हिस्से (लम्बर स्पाइन) और सैक्रम को प्रभावित करता है, और जब इसका पता चलता है, यह बहुत बड़ा हो चुका होता है। यह ट्यूमर तंत्रिका मूलों तक फैल सकता है।
इसके लक्षणों में शामिल हो सकते हैं, दर्द का धीरे-धीरे शुरू होना और ट्यूमर बढ़ने के साथ दर्द बढ़ना, सुन्न होना, कमज़ोरी, कब्ज़ और मूत्र न रोक पाना (ब्लैडर पर नियंत्रण खोना)।
ट्यूमर को सर्जरी द्वारा निकाल देना ही इसका सही इलाज होता है लेकिन यह तभी किया जा सकता है जब तंत्रिका-संरचनायें प्रभावित न हों, क्योंकि आम तौर पर वे ट्यूमर के बहुत पास होती हैं। रेडियेशन थेरेपी भी की जा सकती है।
- ईविंग्स सारकोमाः यह बहुत अधिक मैलिग्नेंट प्राइमरी बोन ट्यूमर है, जो अक्सर बच्चों (10-12 वर्ष) में पाया जाता है। यह स्त्रियों से अधिक पुरुषों में पाया जाता है और 30 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों को बहुत कम होता है। रीढ़ की हड्डी में यह आम सैक्रम में सबसे अधिक और उसके बाद लम्बर और थोरैसिक कशेरुकाओं में पाया जाता है। यह ट्यूमर रीढ़ के पिछले हिस्से के तत्त्वों तक भी फैल सकता है। ईविंग्स सारकोमा सर्वाइकल स्पाइन को बहुत ही कम प्रभावित करता है।
इसके मरीज़ ज़्यादातर दर्द की शिकायत करते हैं।
इसके इलाज के लिए प्रायः सर्जरी द्वारा ट्यूमर निकालने की विधि रेडियेशन थेरेपी और कीमोथेरेपी का संयुक्त रूप से प्रयोग किया जाता है।
- लसीका बुर्द (लिम्फ़ोमा): नॉन-हॉजकिन्स लिम्फ़ोमा कभी-कभी रीढ़ पर भी असर करता है; इसके होने का कारण ज्ञात नहीं है। ट्यूमर हड्डी (वर्टीब्रल बॉडी) से स्पाइनल कैनाल तक फैल सकता है जिससे सुषुम्ना दबने लगती है।
सबसे आम लक्षण हैं, दर्द, वज़न कम होना, बुख़ार और दबाने से पता लगने वाली सूजन।
लिम्फ़ोमा आम तौर पर रेडियेशन और कीमोथेरेपी से ठीक होता है। सर्जरी की ज़रूरत तब पड़ती है जब सुषुम्ना दब रही हो या रीढ़ अस्थिर हो।
- मल्टिपल मायलोमाः मल्टिपल मायलोमा हड्डियों और रीढ़ की हड्डी का सबसे आम प्राइमरी मैलिग्नेंट ट्यूमर है। इसका कारण ज्ञात नहीं है। मल्टिपल मायलोमा बच्चों में बहुत कम होता है, 45 वर्ष से कम आयु के लोगों में भी इसके पाये जाने का प्रतिशत कम है और यह सबसे अधिक 60-65 आयुवर्ग के लोगों को होता है।
यह बीमारी हड्डी को नष्ट कर देती है और अन्य अंगों, जैसे कि गुर्दों तक भी फैल सकती है।
इसके लिए सबसे आम इलाज रेडियेशन और कीमोथेरेपी है। सुषुम्ना के दबने या रीढ़ के अस्थिर होने पर सर्जरी की ज़रूरत हो सकती है।
- ऑस्टिओसारकोमाः रीढ़ की हड्डी में ऑस्टियोसारकोमा बहुत कम होता है। यह आम तौर पर 40-50 वर्ष के मरीज़ों में पाया जाता है और पुरुषों को अधिक होता है। पैजेट्स डिज़ीज़ के कुछ मरीज़ों को स्पाइनल ऑस्टिओसारकोमा हो जाता है।
यह मैलिग्नेंट ट्यूमर रीढ़ के किसी भी हिस्से में हो सकता है, हालाँकि लम्बर और सैक्रल में ज़्यादा आम है। ऑस्टियोसारकोमा शरीर के अन्य भागों में भी फैल जाता है।
लक्षणों में शामिल हैं, दर्द, छूने पर पिंड महसूस होना, लंबाई घटना, और तंत्रिकाओं का ह्रास (जैसे कमज़ोरी, सुन्न होना)।
इलाज का आम तरीका है, सर्जरी द्वारा ट्यूमर निकालना और उसके बाद रेडियेशन और कीमोथेरेपी।
- कोशिका मज्जाबुर्द (प्लाज़्मासाइटोमा) : रीढ़ की हड्डी में प्लाज़्मासाइटोमा ऐसा बोन ट्यूमर है जो सबसे अधिक थोरैसिक कशेरुकाओं को प्रभावित करता है। प्लाज़्मासाइटोमा आम तौर पर अस्थि मज्जा में होता है और युवाओं को प्रभावित करता है। प्लाज़्मासाइटोमा चूँकि मल्टिपल मायलोमा में परिवर्तित हो सकता है इसलिए इसका पता लगने पर मरीज़ पर कई वर्षों तक सावधानी से निगाह रखी जाती है। इस ट्यूमर के दबाव के कारण फ्रैक्चर भी हो सकते हैं, जिससे तंत्रिका मूल पर असर पड़ सकता है और सुषुम्ना पर भी दबाव पड़ सकता है। इसके लक्षण, रीढ़ की हड्डी के किस स्तर पर ट्यूमर हुआ है, इस पर निर्भर होते हैं, हालाँकि दर्द अत्यधिक होता है।
इसके लिए सामान्यतः रेडियेशन थेरेपी दी जाती है। जिन मरीज़ों की तंत्रिकाओं पर पड़ रहा दबाव कम करने की तथा/अथवा रीढ़ को स्थिर बनाने की ज़रूरत हो, उनकी सर्जरी भी की जाती है। संबंधित लिंक्स
उपकरणों सहित रीढ़ की हड्डी का संयोजन
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