स्पोंडिलोलिस्थीसिस – डीजेनेरेटिव

स्पोंडिलोलिस्थीसिस, रीढ़ की हड्डी की बीमारी है, जिसमें एक कशेरुका, नीचे वाली कशेरुका के ऊपर खिसक आती है। डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस, सामान्यतः लम्बर स्पाइन, ख़ास तौर से L4-L5 में होती है। कशेरुकाओं की संरचना में होने वाले परिवर्तनों के फलस्वरूप कशेरुकाओं के बीच के जोड़ आगे खिसक आते हैं। इस प्रकार की स्पोंडिलोलिस्थीसिस बड़ी उम्र की महिला रोगियों में सबसे अधिक पाई जाती है, जो सामान्यतः 60 वर्ष से अधिक आयु की हों।

लक्षण
स्पोंडिलोलिस्थीसिस के लक्षणों में शामिल हो सकते हैं:

  • पीठ के निचले हिस्से, जाँघों तथा/अथवा टाँगों में दर्द, विशेष रूप से व्यायाम के बाद, जो वहाँ से नितम्बों तथा/अथवा टाँगों में नीचे की ओर (शियाटिका) बढ़ता है।
  • पेशियों में ऐंठन
  • टाँगों में कमज़ोरी
  • पिडंली की पेशियों में कसाव
  • असमान चाल या लँगड़ाना

स्पोंडिलोलिस्थीसिस के कुछ रोगियों में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते और उन्हें बीमारी का पता तब चलता है जब वे स्वास्थ्य की किसी अन्य समस्या के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं। लेकिन, डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस के गंभीर मामलों में वर्टिब्रल बॉडी के आगे खिसकने से अक्सर स्पाइनल स्टेनोसिस, तंत्रिकाओं का दबना, दर्द और तंत्रिका-तंत्र को नुकसान हो सकता है।

डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस क्यों होती है?
डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस, आम तौर पर बढ़ती उम्र और रीढ़ की हड्डी के “घिसने” के कारण होती है, जिससे कशेरुकाओं के हिस्से टूटने लगते हैं। यह इस्थमिक स्पोंडिलोलिस्थीसिस से अलग तरह का रोग है क्योंकि इसमें हड्डी का कोई विकार नहीं होता। डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस के प्रारंभिक चरणों में स्पाइनल स्टेनोसिस होने की संभावना रहती है।

निदान
इसका सही निदान बहुत आवश्यक है। डॉ. लोनर आधुनिकतम निदानात्मक तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं और साथ ही विशेषज्ञ चिकित्सों द्वारा भी जाँच की जाती है ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि निदान सही है। निदान के साधनों में शामिल हैं:

  • चिकित्सीय पृष्ठभूमि। आपसे पूछा जायेगा कि आपके लक्षण क्या हैं, वे कितने गंभीर हैं और आपने पहले क्या उपचार करवाये हैं।
  • शारीरिक जाँच। आपकी गतिशीलता की सीमाओं, संतुलन की समस्याओं, दर्द, शरीर के छोरों (हाथों, पैरों) में रिफ़्लेक्स की कमी, पेशियों की कमज़ोरी, संवेदना की कमी और तंत्रिकाओं को हुए नुकसान के अन्य लक्षणों को जानने के लिए आपकी सावधानी से जाँच की जायेगी।
  • निदानात्मक परीक्षण। आम तौर पर, हम एक्स-रे से शुरुआत करते हैं, ताकि पता लग जाये कि ट्यूमर और संक्रमण जैसी अन्य समस्यायें तो नहीं हैं। निदान की पुष्टि करने के लिए हम CT स्कैन या MRI भी कर सकते हैं। कुछ मरीज़ों का मायलोग्राम भी कराया जायेगा। इस परीक्षण में तरल डाई का प्रयोग किया जाता है जिसे स्पाइनल कॉलम (रीढ़ की हड्डी) में इंजेक्ट करके देखा जाता है कि तंत्रिकायें किस हद तक दब रही हैं, संबंधित कशेरुकायें कितनी खिसक आई हैं और गतिशीलता कितनी असामान्य है।

स्पोंडिलोलिस्थीसिस का वर्गीकरण
कशेरुकाओं के फिस्लाव (स्लिपेज) का स्तर कम है या बहुत गंभीर, इसका आकलन या “वर्गीकरण” करने के लिए कई तरीके प्रयोग में लाये जाते हैं। हम आपकी स्पोंडिलोलिस्थीसिस के विस्तार के बारे में आपसे चर्चा करेंगे।

आम तौर पर, चिकित्सक स्लिप्स के वर्गीकरण के लिए मेयर्डिंग ग्रेडिंग सिस्टम का प्रयोग करते हैं। इस प्रणाली को समझना अपेक्षाकृत सरल है। फिसलाव का वर्गीकरण इस आधार पर किया जाता है कि एक कशेरुका अपने नीचे वाली कशेरुका के ऊपर कितने प्रतिशत तक खिसक गई है। इस तरह प्रथम श्रेणी (ग्रेड I) स्लिप का मतलब है कि कशेरुका का 1-24% हिस्सा नीचे वाली कशेरुका के ऊपर से खिसक गया है। द्वितीय श्रेणी (ग्रेड II) से 25-49% खिसकने का पता चलता है। तृतीय श्रेणी (ग्रेड III) से 50-74% खिसकने का और चतुर्थ श्रेणी (ग्रेड IV) से 75-99% खिसकने का संकेत मिलता है। अगर कशेरुका नीचे वाली कशेरुका के ऊपर से पूरी तरह खिसककर अलग हो चुकी है तो उसे पाँचवीं श्रेणी (ग्रेड V) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, और इसे स्पोंडिलोलिस्थीसिस कहा जाता है।

डॉ. लोनर सबसे उपयुक्त इलाज का फ़ैसला करते समय खिसकने की श्रेणी, और असाध्य दर्द और तंत्रिका-तंत्र के लक्षण जैसे तत्त्वों पर विचार करते हैं। डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस के अधिकांश मामले ग्रेड I या ग्रेड II के होते हैं। सामान्यतः अधिक गंभीर खिसकाव (विशेष रूप से ग्रेड III और उससे ऊपर) के मामलों में सर्जिकल हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ने की सबसे अधिक संभावना रहती है।

ग़ैर-ऑपरेशन उपचार
डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस के अधिकांश मामलों (विशेष कर ग्रेड I और ग्रेड II) के इलाज के लिए अस्थायी रूप से पूरा आराम, लक्षणों की शुरुआत करने वाली गतिविधियों पर रोक, दर्द/सूजन की दवायें, स्टीरॉयड-एनीस्थेटिक इंजेक्शन, फ़िज़िकल थेरेपी तथा/अथवा स्पाइनल ब्रेसिंग जैसे उपायों का सहारा लिया जाता है।

डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस प्रोग्रेसिव हो सकती है - यानी कि समय के साथ इससे होने वाला नुकसान बढ़ता जायेगा। इसके अलावा, डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस से स्टेनोसिस भी हो सकती है, जिसमें स्पाइनल कैनाल संकुचित हो जाती है और सुषुम्ना दबने लगती है। यदि स्टेनोसिस गंभीर है और सभी ग़ैर-ऑपरेशन इलाज विफल रहे हैं, तो सर्जरी आवश्यक हो जाती है।

सर्जिकल उपचार
सर्जरी की बहुत कम आवश्यकता पड़ती है, इसका सहारा तभी लिया जाता है जब मामला गंभीर (सामान्यतः ग्रेड III और अधिक) हो, तंत्रिका-तंत्र को नुकसान हो चुका हो, असाध्य दर्द हो और सभी ग़ैर-ऑपरेशन विकल्प विफल हो चुके हों।

स्पोंडिलोलिस्थीसिस के इलाज में काम आने वाली सबसे आम सर्जिकल प्रक्रिया है लैमिनेक्टॉमी और संयोजन । इस प्रक्रिया में, कशेरुका की छत (लैमीनी) को हटाकर या काट-छाँटकर स्पाइनल कैनाल को चौड़ा किया जाता है। यह तंत्रिकाओं के लिए अधिक जगह बनाने और सुषुम्ना पर पड़ रहे दबाव को कम करने के लिए किया जाता है। हो सकता है कि सर्जन को कशेरुकाओं को आपस में संयोजित करने की भी ज़रूरत पड़े। यदि संयोजन किया जाता है, तो विभिन्न उपकरण (जैसे पेंच या पिंजरे) भी इम्प्लांट किये जा सकते हैं ताकि संयोजन को बढ़ावा और अस्थिर रीढ़ को सहारा मिले।

डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस के मामले का उदाहरण

इस 58 वर्षीय महिला को L4/L5 स्तर की डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस थी, जैसा कि एक्स-रे और MRI से स्पष्ट है। उन्हें दूर तक चलने में कठिनाई होती थी और पीठ तथा टाँगों में दर्द रहता था। इसका लैमिनेक्टॉमी और इंस्ट्रुमेंटेशन सहित फ़्यूज़न से इलाज किया गया (इस ऑपरेशन के विवरण के लिए PLIF, ALIF, और TLIF पर लेख देखें)।

निष्कर्ष
उम्र बढ़ने के साथ अधिकतर लोगों की रीढ़ में डीजेनेरेटिव परिवर्तन होते हैं। लेकिन, गंभीर स्पोंडिलोलिस्थीसिस जनसंख्या के केवल कुछ प्रतिशत लोगों को ही प्रभावित करती है। कुल मिलाकर, रीढ़ की अधिकांश डीजेनेरेटिव गड़बड़ियों का ग़ैर-सर्जिकल तरीकों से सफल इलाज किया जा सकता है। Scoliosis Associates में, हम आपके साथ मिलकर ऐसे इलाज के तरीके ढूँढ़ते हैं, जो आपके लिए सबसे अच्छे हों और जिनकी मदद से आप फिर से सक्रिय जीवन बिता सकते हों।

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