


स्पोंडिलोलिस्थीसिस सिंहावलोकनस्पोंडिलोलिस्थीसिस रीढ़ की हड्डी की एक बीमारी है, जिसमें एक कशेरुका, अपने नीचे वाली कशेरुका पर खिसक आती है। स्लिप के कारण के आधार पर स्पोंडिलोलिस्थीसिस के छह प्रकार होते हैं। इनमें डिस्प्लास्टिक या जन्मजात प्रकार भी शामिल है, जो रीढ़ के जोड़ों की असामान्यता के कारण होता है। इस्थमिक प्रकार, कशेरुका के पार्स इन्ट्राटिकुलरिस (pars interarticularis) नामक एक हिस्से के फ्रैक्चर के कारण होता है, जिससे कुछ मरीज़ों की कशेरुका स्लिप कर जाती है। इस फ्रैक्चर को स्पोंडिलोलिसिस कहते हैं। एक तीसरा और बहुत आम प्रकार है डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस, जो वयस्क मरीज़ों में सबसे अधिक L4-5 स्तर पर होती है और चक्रिकाओं के ह्रास की बीमारी और रीढ़ के जोड़ों की गठिया का नतीजा होती है। इसके साथ प्रायः स्पाइनल स्टेनोसिस या स्पाइनल कैनाल का संकुचित होना भी पाया जाता है। इसके कारण अक्सर पीठ का दर्द और चलना-फिरना सीमित हो जाता है। पहले दो प्रकार की स्पोंडिलोलिस्थीसिस (डिस्प्लास्टिक और इस्थमिक) अक्सर बचपन में होती है और L5-S1 स्तर या रीढ़ के सबसे निचले जोड़ में पाई जाती है। स्पोंडिलोलिस्थीसिस का एक अन्य प्रकार है, ट्रॉमाटिक, जो कशेरुका के पार्स इन्ट्राटिकुलरिस (pars interarticularis) के अलावा दूसरे भाग के फ्रैक्चर के कारण होती है। पैथोलॉजिक प्रकार, ट्यूमर या संक्रमण के कारण रीढ़ की हड्डी के घिसकर कम हो जाने का नतीजा है, जिससे अस्थिरता पैदा होती है और कशेरुका खिसक आती है। स्पोंडिलोलिस्थीसिस के अंतिम प्रकार को ऐट्रोजेनिक कहा जाता है। यह उन मरीज़ों में पाई जाती है, जिनकी व्यापक लैमिनेक्टॉमी या डीकम्प्रेशन हुआ हो और उसकी वजह से रीढ़ में अस्थिरता आ गई हो। स्पोंडिलोलिस्थीसिस के प्रत्येक प्रकार के अपने अलग लक्षण और अलग इलाज होते हैं, जो उसकी विशेष ख़ामियों को दूर करने पर केन्द्रित होते हैं (देखें इस्थमिक और डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस पर लेख)। स्पोंडिलोलिस्थीसिस के बाल या वयस्क मरीज़ों में पीठ तथा/अथवा टाँगों का दर्द, मूत्र को रोक न पाना या बार-बार होना पाया जा सकता है, या यह भी हो सकता है कि उनमें कोई लक्षण न हों या बहुत कम हों। मरीज़ का इलाज उसके लक्षणों की गंभीरता और खिसकने (स्लिपेज) की डिग्री और विस्तार पर निर्भर होता है। उपचार ग़ैर-ऑपरेशनः स्पोंडिलोलिस्थीसिस से पीड़ित बच्चे को, जिसकी पीठ में दर्द रहता है, गतिविधियाँ बदलने की सलाह दी जाती है। खेलकूद की गतिविधियाँ कम की जाती हैं और अपेक्षाकृत अधिक आराम करने को कहा जाता है। स्पोंडिलोलिस्थीसिस के मरीज़ अक्सर हाइपर-एक्सटेंशन से जुड़ी गतिविधियों, जैसे कि जिम्नास्टिक, फुटबॉल या कुश्ती से जुड़े होते हैं। उन्हें ऐसी गतिविधियाँ बंद कर देनी चाहिए। अगर गतिविधियाँ बदलने से भी दर्द कम नहीं होता तो कम से कम तीन से छह महीनों तक पूरे समय ब्रेस पहनने की सलाह दी जाती है। कभी-कभी दबाव के कारण हुआ फ्रैक्चर ब्रेसिंग से ठीक हो जाता है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। फ्रैक्चर ठीक न भी हो, तो भी अधिकतर मरीज़ों को दर्द से राहत मिलती है। वयस्क मरीज़ों में दर्द ही प्रायः प्रमुख शिकायत होती है और उसकी वजह से उनकी दूर तक चलने की क्षमता कम हो जाती है। मरीज़ों को फ़िज़िकल थेरेपी कराने को कहा जाता है और ग़ैर-स्टीरॉयड, सूजन-रोधी दवाओं का नुस्ख़ा बताया जाता है। कुछ गिने-चुने मामलों में एपिड्यूरल स्टीरॉयड इंजेक्शन से या चयनित तंत्रिका मूल ब्लॉक के प्रयोग करने से लाभ होता है। ऑपरेशन से इलाजः स्पोंडिलोलिस्थीसिस के बाल मरीज़ों को जब ग़ैर-सर्जिकल तरीकों से कोई लाभ नहीं होता, तब संयोजन (फ़्यूज़न) ऑपरेशन की राय दी जाती है। अगर स्लिपेज अपेक्षाकृत कम है, तो फ़्यूज़न वहीं कर दिया जाता है। यह सामान्यतः पीछे की ओर से (पोस्टीरियर) किया जाता है और इसके साथ रीढ़ को स्थिर करने के लिए उपकरण भी लगाये जाते हैं। स्लिपेज अधिक होने पर, आम तौर से पुनः स्थापन (रिडक्शन) की राय दी जाती है, ताकि खिसकी हुई कशेरुका को अधिक स्वाभाविक स्थिति में लाया जा सके। रिडक्शन के साथ कुछ तंत्रिका संबंधी ख़तरे जुड़े होते हैं, जैसे कि अँगूठे या पैर में कमज़ोरी आना लेकिन ये समस्यायें लगभग हमेशा ही अस्थायी होती हैं। दबाव के कारण हुए फ्रैक्चर (स्पोंडिलोलिसिस) से जुड़े मामूली स्लिपेज के मरीज़ के लिए एक अंतिम विकल्प यह है कि उसके स्ट्रैस फ्रैक्चर की बोन ग्राफ़्टिंग और स्पाइनल इम्प्लांट्स से मरम्मत कर दी जाये। अधिकतर मरीज़ों को इन ऑपरेशनों के बाद दर्द से राहत मिल जाती है और वे अपनी अधिकांश गतिविधियाँ फिर से कर सकते हैं। डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस के साथ जिन मरीज़ों में स्पाइनल स्टेनोसिस भी पाई जाती है, उनके इलाज के लिए डीकंप्रेशन, या लैमिनोक्टॉमी प्रक्रिया अपनाई जाती है, और उसके साथ ही इम्प्लांट्स का प्रयोग करके फ़्यूज़न भी कर दिया जाता है। कुछ मामलों में, चक्रिका निकाल दी जाती है और इंटरबॉडी फ़्यूज़न किया जाता है, जैसा कि डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस के खंड में बताया गया है। इस्थमिक स्पोंडिलोलिस्थीसिस के मामले का उदाहरण
इस किशोर उम्र बालिका को L5/S1 की उच्च श्रेणी की स्पोंडिलोलिस्थीसिस थी। ऑपरेशन से पूर्व के एक्स-रे और MRI से इसकी स्लिप की गंभीरता का पता चलता है। इस स्लिप को पीछे की ओर से ऑपरेशन कर, संयोजन और उपकरण द्वारा दुरुस्त किया गया। इस मरीज़ को सर्जरी कराए 4 वर्ष हो चुके हैं और यह सक्रिय है और इसकी पीठ में दर्द भी नहीं है। डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस के मामले का उदाहरण
इस 58 वर्षीय महिला को L4/L5 स्तर की डीजेनेरेटिव स्पोंडिलोलिस्थीसिस थी, जैसा कि एक्स-रे और MRI से स्पष्ट है। उन्हें दूर तक चलने में कठिनाई होती थी और पीठ तथा टाँगों में दर्द रहता था। इसका लैमिनेक्टॉमी और इंस्ट्रुमेंटेशन सहित फ़्यूज़न से इलाज किया गया (इस ऑपरेशन के ब्यौरे के लिए PLIF, ALIF, और TLIF पर लेख देखें)।
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