स्कोलियोसिस के असामान्य कारण
स्कोलियोसिस के अनेक कारण होते हैं। वैसे उसके इतने प्रकार हैं कि सबके नाम और पूरा विवरण यहाँ देना संभव नहीं है। इसलिए स्कोलियोसिस के कुछ असामान्य प्रकारों की संक्षिप्त जानकारी यहाँ दी जा रही है।
मार्फ़ेन्स सिंड्रोम मार्फ़ेन्स सिंड्रोम, कोलेजन क्रॉस-लिकिंग के लिए ज़िम्मेदार शुक्राणुओं (क्रोमोसोम) में आनुवांशिक बदलाव के कारण होता है। मार्फ़ेन्स सिंड्रोम के मरीज़ बहुत ही अलग दिखाई पड़ते हैं। वे लंबे और दुबले होते हैं और उनकी बाँहों का फैलाव और उँगलियाँ भी लंबी होती है। ऐसा माना जाता है कि अब्राहम लिंकन को मार्फ़ेन्स सिंड्रोम था। इन मरीज़ों को सामान्यतः स्कोलियोसिस के साथ, उससे जुड़ी अन्य समस्यायें भी होती हैं। इनमें आँख की लेंस का जगह से हट जाना, एओर्टा का हृदय से बाहर निकलने की जगह पर अधिक चौड़ा होना, हृदय के वॉल्व में असामान्यता, घुटनों के सटे होने की विकृतियाँ, पैरों में असामान्यता जैसे कि गाँठें, छाती की दीवार की विकृतियाँ और काइफ़ोसिस शामिल हैं।
मार्फ़ेन्स सिंड्रोम के मरीज़ों के झुकाव अक्सर बहुत तेज़ी से बढ़ते हैं, जिसे सर्जरी के द्वारा ठीक करने की ज़रूरत होती है। इन व्यक्तियों में मौजूद लिगामेंट्स (स्नायुओं) के ढीलेपन के कारण रीढ़ के संभवित असंतुलन को ठीक करने के लिए लंबे संयोजन की ज़रूरत होती है और यह अक्सर आगे और पीछे से की जाने वाली शल्यचिकित्सा पद्धतियों को संयुक्त रूप से अपनाकर किया जाता है। मार्फ़ेन्स सिंड्रोम के मरीज़ों के इलाज का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, ऑपरेशन के दौरान सावधानी से देखभाल, जिसमें रक्तचाप को स्वीकार्य स्तर पर बनाये रखने का ख़ास ध्यान रखा जाता है ताकि महाधमनी की दशा न बिगड़े।
मार्फ़ेन्स सिंड्रोम के मामले का उदाहरण

मार्फ़ेन्स सिंड्रोम और गंभीर लम्बर स्कोलियोसिस तथा काइफ़ोसिस के मरीज़, इस 15 वर्षीय बालक का इलाज आगे और पीछे के स्पाइनल फ़्यूज़न तथा इंस्ट्रुमेंटेशन से किया गया। इसके बाद वह पूरी तरह सक्रिय हो गया।
एहलर्स-डैनलोस सिंड्रोम यह भी जोड़ने वाले ऊतकों की एक बीमारी है, जिसमें लचीलेपन के जीन (gene) असामान्य होते हैं। इसके कारण इन लोगों में लिगामेंट्स काफी ढीले हो जाते हैं और अक्सर स्पाइनल विकृतियाँ भी पैदा हो जाती हैं। मार्फ़ेन्स सिंड्रोम की ही तरह, इसके मरीज़ों को भी सर्जरी की ज़रूरत होने पर प्रायः एक लंबे संयोजन की राय दी जाती है।
न्यूरोफ़ाइब्रोमेटोसिस न्यूरोफ़ाइब्रोमेटोसिस एक बिनाइन ट्यूमर की बीमारी है, जो स्पाइनल कैनाल से निकलने वाली तंत्रिकाओं के खोल को प्रभावित करती है। इसके चार प्रकार हैं, इनमें से टाइप 1 (NF-1) रीढ़ की हड्डी से सबसे अधिक संबंधित होता है, इसके साथ अन्य संभावित असामान्यतायें भी जुड़ी हो सकती हैं। स्कोलियोसिस या काइफ़ोसिस के रूप में रीढ़ की विकृति स्पाइनल कॉलम की हड्डियों के घिसने के कारण या फिर रीढ़ की हड्डी से कोई स्पष्ट संबंध न होने पर भी हो सकती है। न्यूरोफ़ाइब्रोमेटोसिस के मरीज़ों में त्वचा की रंग कणिकाओं की असामान्यतायें या बड़ी चित्तियाँ पायी जाती है। उन्हें अन्य अनेक लक्षणों के अलावा त्वचा का बिनाइन ट्यूमर भी हो सकता है। न्यूरोफ़ाइब्रोमेटोसिस के मरीज़ों को स्कोलियोसिस के इलाज के लिए सर्जरी की ज़रूरत हो सकती है। इसका इलाज प्रायः सामने और पीछे की संयुक्त शल्यक्रिया पद्धति से किया जाता है ताकि हड्डी का ठीक होना सुनिश्चित किया जा सके।
न्यूरोफ़ाइब्रोमेटोसिस के मामले का उदाहरण

न्यूरोफ़ाइब्रोमेटोसिस की मरीज़ इस 11 वर्षीय बालिका को गंभीर स्कोलियोसिस और काइफ़ोसिस थी। उसका इलाज, सामने और पीछे से, रीढ़ की हड्डी के संयोजन (स्पाइनल फ़्यूज़न) और इंस्ट्रुमेंटेशन से किया गया, जिससे उसके संतुलन में उत्कृष्ट सुधार आया।
विकास संबंधी बीमारियाँ या डिस्प्लेसिया विकास और वृद्धि में अनेक असामान्यतायें हो सकती हैं, जैसे कि एकोन्ड्रोप्लेजिया, या आम बौनापन, जो आनुवंशिक परिवर्तनों के कारण होता है। बौनेपन की और भी कई बीमारियाँ हैं, जो उतनी आम नहीं हैं, फिर भी स्कोलियोसिस या काइफ़ोसिस से संबंधित हो सकती हैं। इन बीमारियों के मरीज़ों की विशेष प्रकार की समस्यायें होती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ मरीज़ों की स्पाइनल कैनाल बहुत छोटी होती है और उन्हें सुषुम्ना तथा तंत्रिका मूलों से दबाव कम करने के लिए डीकम्प्रेशन या लैमिनेक्टॉमी की ज़रूरत होती है। कुछ अन्य में सर्वाइकल स्पाइन की अस्थिरता होती है, जिसमें गर्दन को सहारा देने के लिए संयोजन (फ़्यूज़न) की ज़रूरत पड़ती है।
वृद्धि डिस्प्लेसिया के मामले का उदाहरण


स्पोंडिलोएपिफ़ीसील डिस्प्लेसिया, जो वृद्धि डिस्प्लेसिया का एक प्रकार है, की मरीज़ इस 13 वर्षीय बालिका को 60 डिग्री स्कोलियोसिस और 70 डिग्री काइफ़ोसिस थी, जिसका इलाज आगे-पीछे की सर्जरी से किया गया जिससे उत्कृष्ट सुधार हुआ।
स्कोलियोसिस और काइफ़ोसिस के अनेक कारण हैं और सभी की अपनी अलग विशेषतायें हैं। इन बीमारियों की सर्जरी प्रत्येक मरीज़ और उसकी स्थिति के अनुरूप की जाती है।
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